लिपिं दृशा भित्तिविभूषणं त्वां
नृपः पिबन्नादरनिर्निमेषः ।
चक्षुर्झरैरर्पितमात्मचक्षू-
रागं स धत्ते रचितं त्वया नु ॥
लिपिं दृशा भित्तिविभूषणं त्वां
नृपः पिबन्नादरनिर्निमेषः ।
चक्षुर्झरैरर्पितमात्मचक्षू-
रागं स धत्ते रचितं त्वया नु ॥
नृपः पिबन्नादरनिर्निमेषः ।
चक्षुर्झरैरर्पितमात्मचक्षू-
रागं स धत्ते रचितं त्वया नु ॥
अन्वयः
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आदर-निर्निमेषः नृपः दृशा भित्ति-विभूषणम् लिपिम् त्वाम् पिबन्, सः चक्षुः-झरैः अर्पितम् त्वया रचितम् आत्म-चक्षू-रागम् नु धत्ते।
Summary
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"The king, unblinking with adoration, drinks with his eyes your painted form, an ornament on the wall. Through his tears, he applies to the painting the redness of his own eyes, as if it were a red dye offered by you."
पदच्छेदः
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| लिपिम् | लिपि (२.१) | the painting |
| दृशा | दृश् (३.१) | with his eyes |
| भित्तिविभूषणम् | भित्तिविभूषण (२.१) | the ornament of the wall |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| नृपः | नृप (१.१) | the king |
| पिबन् | पिबत् (√पा+शतृ, १.१) | drinking |
| आदरनिर्निमेषः | आदर–निर्निमेष (१.१) | unblinking with adoration |
| चक्षुर्झरैः | चक्षुस्–झर (३.३) | by streams from his eyes |
| अर्पितम् | अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, २.१) | offered |
| आत्मचक्षूरागम् | आत्मन्–चक्षुस्–राग (२.१) | the redness of his own eyes |
| सः | तद् (१.१) | he |
| धत्ते | धत्ते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | applies |
| रचितम् | रचित (√रच्+क्त, २.१) | created |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| नु | नु | as it were |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लि | पिं | दृ | शा | भि | त्ति | वि | भू | ष | णं | त्वां |
| नृ | पः | पि | ब | न्ना | द | र | नि | र्नि | मे | षः |
| च | क्षु | र्झ | रै | र | र्पि | त | मा | त्म | च | क्षू |
| रा | गं | स | ध | त्ते | र | चि | तं | त्व | या | नु |
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