मावापदुन्निद्रसरोजपूजा
श्रियं शशी पद्मनिमीलितेजाः ।
अक्षिद्वयेनैव निजाङ्करङ्को-
रलंकृतस्तामयमेति मन्ये ॥
मावापदुन्निद्रसरोजपूजा
श्रियं शशी पद्मनिमीलितेजाः ।
अक्षिद्वयेनैव निजाङ्करङ्को-
रलंकृतस्तामयमेति मन्ये ॥
श्रियं शशी पद्मनिमीलितेजाः ।
अक्षिद्वयेनैव निजाङ्करङ्को-
रलंकृतस्तामयमेति मन्ये ॥
अन्वयः
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पद्म-निमीलित-ईजाः शशी 'उन्निद्र-सरोज-पूजा श्रियम् मा अवापत्' इति हेतोः, निज-अङ्क-रङ्कोः अक्षि-द्वयेन एव अलंकृतः सन्, ताम् श्रियम् अयम् एति इति मन्ये ।
Summary
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I think that the moon, whose splendor closes lotuses, lest the beauty of worship with blooming lotuses be lost to it, attains that very beauty by being adorned only with the two eyes of the deer in its own lap.
पदच्छेदः
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| मा | मा | let not |
| अवापत् | अवापत् (अव√आप् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | be lost |
| उन्निद्रसरोजपूजा | उन्निद्र–सरोज–पूजा (१.१) | worship with blooming lotuses |
| श्रियम् | श्री (२.१) | the beauty of |
| शशी | शशिन् (१.१) | the moon |
| पद्मनिमीलितेजाः | पद्म–निमीलित–ईजस् (१.१) | whose splendor closes lotuses |
| अक्षिद्वयेन | अक्षि–द्वय (३.१) | by the pair of eyes |
| एव | एव | only |
| निजाङ्करङ्कोः | निज–अङ्क–रङ्कु (६.१) | of the deer in its own lap |
| अलंकृतः | अलंकृत (अलम्√कृ+क्त, १.१) | adorned |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| अयम् | इदम् (१.१) | this (moon) |
| एति | एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I think |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | वा | प | दु | न्नि | द्र | स | रो | ज | पू | जा |
| श्रि | यं | श | शी | प | द्म | नि | मी | लि | ते | जाः |
| अ | क्षि | द्व | ये | नै | व | नि | जा | ङ्क | र | ङ्को |
| र | लं | कृ | त | स्ता | म | य | मे | ति | म | न्ये |
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