पृष्ठेऽपि किं तिष्ठति नाथ रङ्कु-
र्विधोरङ्क इवेति शङ्का ।
तत्त्वाय तिष्ठस्व मुखे स्व एवं
यद्द्वैरथे पृष्ठमपश्यदस्य ॥
पृष्ठेऽपि किं तिष्ठति नाथ रङ्कु-
र्विधोरङ्क इवेति शङ्का ।
तत्त्वाय तिष्ठस्व मुखे स्व एवं
यद्द्वैरथे पृष्ठमपश्यदस्य ॥
र्विधोरङ्क इवेति शङ्का ।
तत्त्वाय तिष्ठस्व मुखे स्व एवं
यद्द्वैरथे पृष्ठमपश्यदस्य ॥
अन्वयः
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नाथ, 'किं रङ्कुः विधोः अङ्के इव (तव) पृष्ठे अपि तिष्ठति?' इति (मे) शङ्का। तत्त्वाय (तत्त्वनिर्णयाय) स्व (मम) मुखे (अभिमुखं) एवं तिष्ठस्व, यत् (यथा) (अहं तव पृष्ठं पश्येयम्)। (ननु कोऽपि) द्वैरथे अस्य (नलस्य) पृष्ठं न अपश्यत्।
Summary
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Damayanti says: "O Lord, I have a doubt: is there a deer on your back, just as there is on the moon's lap? To find out the truth, please stand facing me so I can see your back—a sight no one ever saw in a duel."
पदच्छेदः
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| पृष्ठे | पृष्ठ (७.१) | on the back |
| अपि | अपि | also |
| किं | किम् | does |
| तिष्ठति | तिष्ठति (√स्था कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reside |
| नाथ | नाथ (८.१) | O lord |
| रङ्कुः | रङ्कु (१.१) | a deer |
| विधोः | विधु (६.१) | of the moon |
| अङ्के | अङ्क (७.१) | in the lap |
| इव | इव | like |
| इति | इति | thus |
| शङ्का | शङ्का (१.१) | a doubt |
| तत्त्वाय | तत्त्व (४.१) | for the truth |
| तिष्ठस्व | तिष्ठस्व (√स्था कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | stand |
| मुखे | मुख (७.१) | in front |
| स्व | स्व (७.१) | of me |
| एवम् | एवम् | in such a way |
| यत् | यत् | that |
| द्वैरथे | द्वैरथ (७.१) | in a duel |
| पृष्ठम् | पृष्ठ (२.१) | the back |
| अपश्यत् | अपश्यत् (√दृश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | saw |
| अस्य | इदम् (६.१) | of his |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पृ | ष्ठे | ऽपि | किं | ति | ष्ठ | ति | ना | थ | र | ङ्कु |
| र्वि | धो | र | ङ्क | इ | वे | ति | श | ङ्का | ||
| त | त्त्वा | य | ति | ष्ठ | स्व | मु | खे | स्व | ए | वं |
| य | द्द्वै | र | थे | पृ | ष्ठ | म | प | श्य | द | स्य |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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