सुधाभुजो यत्परिपीय तुच्छ-
मेतं वितन्वन्ति तदर्हमेव ।
पुरा निपीयास्य पितापि सिन्धु-
रकारि तुच्छः कलशोद्भवेन ॥
सुधाभुजो यत्परिपीय तुच्छ-
मेतं वितन्वन्ति तदर्हमेव ।
पुरा निपीयास्य पितापि सिन्धु-
रकारि तुच्छः कलशोद्भवेन ॥
मेतं वितन्वन्ति तदर्हमेव ।
पुरा निपीयास्य पितापि सिन्धु-
रकारि तुच्छः कलशोद्भवेन ॥
अन्वयः
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सुधा-भुजः एतं परिपीय यत् तुच्छं वितन्वन्ति, तत् अर्हम् एव। पुरा अस्य पिता सिन्धुः अपि कलश-उद्भवेन निपीय तुच्छः अकारि।
Summary
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That the gods, after drinking the moon's nectar, render it empty during the waning phase is only fitting. For in the past, its father, the Ocean, was also drunk up and made empty by the pitcher-born sage, Agastya.
पदच्छेदः
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| सुधा-भुजः | सुधा–भुज् (१.३) | the nectar-eaters (gods) |
| यत् | यत् | that |
| परिपीय | परिपीय (परि√पा+ल्यप्) | having drunk completely |
| तुच्छम् | तुच्छ (२.१) | empty |
| एतम् | एतद् (२.१) | this one |
| वितन्वन्ति | वितन्वन्ति (वि√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they make |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| अर्हम् | अर्ह (१.१) | proper |
| एव | एव | only |
| पुरा | पुरा | formerly |
| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having drunk |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| पिता | पितृ (१.१) | father |
| अपि | अपि | also |
| सिन्धुः | सिन्धु (१.१) | the ocean |
| अकारि | अकारि (अ√कृ भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.)) | was made |
| तुच्छः | तुच्छ (१.१) | empty |
| कलश-उद्भवेन | कलश–उद्भव (३.१) | by the pitcher-born (Agastya) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | धा | भु | जो | य | त्प | रि | पी | य | तु | च्छ |
| मे | तं | वि | त | न्व | न्ति | त | द | र्ह | मे | व |
| पु | रा | नि | पी | या | स्य | पि | ता | पि | सि | न्धु |
| र | का | रि | तु | च्छः | क | ल | शो | द्भ | वे | न |
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