मृगस्य लोभात्खलु सिंहिकायाः
सूनुर्मृगाङ्कं कवलीकरोति ।
स्वस्यापि दानादमुमङ्कसुप्तं
नोज्झन्मुदा तेन च मुच्यतेऽयम् ॥
मृगस्य लोभात्खलु सिंहिकायाः
सूनुर्मृगाङ्कं कवलीकरोति ।
स्वस्यापि दानादमुमङ्कसुप्तं
नोज्झन्मुदा तेन च मुच्यतेऽयम् ॥
सूनुर्मृगाङ्कं कवलीकरोति ।
स्वस्यापि दानादमुमङ्कसुप्तं
नोज्झन्मुदा तेन च मुच्यतेऽयम् ॥
अन्वयः
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सिंहिकायाः सूनुः (राहुः) खलु मृगस्य लोभात् मृगाङ्कं कवलीकरोति। अङ्क-सुप्तम् अमुं (मृगं) स्वस्य अपि दानात् मुदा न उज्झन् अयं (मृगाङ्कः) तेन (राहुणा) च मुच्यते।
Summary
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Rahu, the son of Simhika, swallows the moon out of greed for the deer in its lap. However, the moon, joyfully refusing to abandon the deer sleeping there even at the cost of its own self, is ultimately released by Rahu.
पदच्छेदः
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| मृगस्य | मृग (६.१) | for the deer |
| लोभात् | लोभ (५.१) | out of greed |
| खलु | खलु | indeed |
| सिंहिकायाः | सिंहिका (६.१) | of Simhika |
| सूनुः | सूनु (१.१) | the son (Rahu) |
| मृगाङ्कम् | मृगाङ्क (२.१) | the moon |
| कवलीकरोति | कवलीकरोति (√कवलीकृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | swallows |
| स्वस्य | स्व (६.१) | of his own |
| अपि | अपि | even |
| दानात् | दान (५.१) | from the giving |
| अमुम् | अदस् (२.१) | that one |
| अङ्क-सुप्तम् | अङ्क–सुप्त (√स्वप्+क्त, २.१) | sleeping in the lap |
| न | न | not |
| उज्झन् | उज्झत् (√उझ्झ्+शतृ, १.१) | abandoning |
| मुदा | मुद् (३.१) | with joy |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| च | च | and |
| मुच्यते | मुच्यते (√मुच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is released |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृ | ग | स्य | लो | भा | त्ख | लु | सिं | हि | का | याः |
| सू | नु | र्मृ | गा | ङ्कं | क | व | ली | क | रो | ति |
| स्व | स्या | पि | दा | ना | द | मु | म | ङ्क | सु | प्तं |
| नो | ज्झ | न्मु | दा | ते | न | च | मु | च्य | ते | ऽयम् |
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