ज्योत्स्नामयं रात्रिकलिन्दकन्या-
पूरानुकारेऽपसृतेऽन्धकारे ।
परिस्फुरन्निर्मलदीप्तिदीपं
व्यक्तायते सैकतमन्तरीपम् ॥
ज्योत्स्नामयं रात्रिकलिन्दकन्या-
पूरानुकारेऽपसृतेऽन्धकारे ।
परिस्फुरन्निर्मलदीप्तिदीपं
व्यक्तायते सैकतमन्तरीपम् ॥
पूरानुकारेऽपसृतेऽन्धकारे ।
परिस्फुरन्निर्मलदीप्तिदीपं
व्यक्तायते सैकतमन्तरीपम् ॥
अन्वयः
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रात्रि-कलिन्दकन्या-पूर-अनुकारे अन्धकारे अपसृते (सति), परिस्फुरत्-निर्मल-दीप्ति-दीपं ज्योत्स्ना-मयं सैकतम् अन्तरीपं व्यक्तायते।
Summary
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When the darkness, which resembles the flooding waters of the Yamuna river at night, has retreated, the sky becomes manifest as a sandy island made of moonlight, illuminated by the lamps of the sparkling, pure lustre of the stars.
पदच्छेदः
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| ज्योत्स्ना-मयम् | ज्योत्स्ना–मय (१.१) | made of moonlight |
| रात्रि-कलिन्दकन्या-पूर-अनुकारे | रात्रि–कलिन्दकन्या–पूर–अनुकार (७.१) | in that which imitates the flood of the Yamuna river at night |
| अपसृते | अपसृत (अप√सृ+क्त, ७.१) | when... has retreated |
| अन्धकारे | अन्धकार (७.१) | darkness |
| परिस्फुरत्-निर्मल-दीप्ति-दीपम् | परिस्फुरत् (परि√स्फुर्+शतृ)–निर्मल–दीप्ति–दीप (१.१) | with lamps of sparkling, pure lustre |
| व्यक्तायते | व्यक्तायते (√व्यक्ताय कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | becomes manifest |
| सैकतम् | सैकत (१.१) | sandy |
| अन्तरीपम् | अन्तरीप (१.१) | island (the sky) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज्यो | त्स्ना | म | यं | रा | त्रि | क | लि | न्द | क | न्या |
| पू | रा | नु | का | रे | ऽप | सृ | ते | ऽन्ध | का | रे |
| प | रि | स्फु | र | न्नि | र्म | ल | दी | प्ति | दी | पं |
| व्य | क्ता | य | ते | सै | क | त | म | न्त | री | पम् |
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