पूरं विधुर्वर्धयितुं पयोधेः
शङ्केऽयमेणाङ्कमणिं कियन्ति ।
पयांसि दोग्धि प्रियविप्रयोग-
सशोककोकीनयने कियन्ति ॥
पूरं विधुर्वर्धयितुं पयोधेः
शङ्केऽयमेणाङ्कमणिं कियन्ति ।
पयांसि दोग्धि प्रियविप्रयोग-
सशोककोकीनयने कियन्ति ॥
शङ्केऽयमेणाङ्कमणिं कियन्ति ।
पयांसि दोग्धि प्रियविप्रयोग-
सशोककोकीनयने कियन्ति ॥
अन्वयः
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(हे) प्रिय-विप्रयोग-सशोक-कोकी-नयने! अयं विधुः पयोधेः पूरं वर्धयितुं एण-अङ्क-मणिं कियन्ति पयांसि दोग्धि, (तव) नयने च कियन्ति (पयांसि दोग्धि इति) शङ्के।
Summary
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"O you whose eyes resemble those of a female Chakravaka bird, sorrowful due to separation from her beloved! I wonder: to swell the ocean's tide, how much water does this moon milk from the moonstone, and how many tears does it milk from eyes like yours?"
पदच्छेदः
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| पूरम् | पूर (२.१) | the tide |
| विधुः | विधु (१.१) | the moon |
| वर्धयितुम् | वर्धयितुम् (√वृध्+णिच्+तुमुन्) | to increase |
| पयोधेः | पयोधि (६.१) | of the ocean |
| शङ्के | शङ्के (√शङ्क् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I suspect |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| एण-अङ्क-मणिम् | एण–अङ्क–मणि (२.१) | the moonstone |
| कियन्ति | कियत् (२.३) | how much |
| पयांसि | पयस् (२.३) | water |
| दोग्धि | दोग्धि (√दुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | milks |
| प्रिय-विप्रयोग-सशोक-कोकी-नयने | प्रिय–विप्रयोग (वि+प्र√युज्)–सशोक–कोकी–नयन (८.१) | O one with eyes like a female chakravaka bird sorrowful from separation from her beloved |
| कियन्ति | कियत् (२.३) | how many |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पू | रं | वि | धु | र्व | र्ध | यि | तुं | प | यो | धेः |
| श | ङ्के | ऽय | मे | णा | ङ्क | म | णिं | कि | य | न्ति |
| प | यां | सि | दो | ग्धि | प्रि | य | वि | प्र | यो | ग |
| स | शो | क | को | की | न | य | ने | कि | य | न्ति |
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