बालेन नक्तंसमयेन मुक्तं
रौप्यं लसद्बिम्बमिवेन्दुबिम्बम् ।
भ्रमिक्रमादुज्झितपट्टसूत्र-
नेत्रावृतिं मुञ्चति शोणिमानम् ॥
बालेन नक्तंसमयेन मुक्तं
रौप्यं लसद्बिम्बमिवेन्दुबिम्बम् ।
भ्रमिक्रमादुज्झितपट्टसूत्र-
नेत्रावृतिं मुञ्चति शोणिमानम् ॥
रौप्यं लसद्बिम्बमिवेन्दुबिम्बम् ।
भ्रमिक्रमादुज्झितपट्टसूत्र-
नेत्रावृतिं मुञ्चति शोणिमानम् ॥
अन्वयः
AI
बालेन नक्तं-समयेन मुक्तं, भ्रमि-क्रमात् उज्झित-पट्टसूत्र-नेत्र-आवृतिं लसत्-बिम्बं रौप्यं बिम्बम् इव, इन्दुबिम्बं शोणिमानं मुञ्चति।
Summary
AI
The disc of the moon gives up its redness, like a shining silver disc-toy released by the child, Evening-time. As it rises (spins), it seems to shed a covering, like a toy whose silken net-cover is removed by the act of whirling.
पदच्छेदः
AI
| बालेन | बाल (३.१) | by a child |
| नक्तं-समयेन | नक्तम्–समय (३.१) | by the evening-time |
| मुक्तम् | मुक्त (√मुच्+क्त, २.१) | released |
| रौप्यम् | रौप्य (२.१) | silver |
| लसत्-बिम्बम् | लसत् (√लस्+शतृ)–बिम्ब (२.१) | a shining disc |
| इव | इव | like |
| इन्दुबिम्बम् | इन्दु–बिम्ब (१.१) | the disc of the moon |
| भ्रमि-क्रमात् | भ्रमि–क्रम (५.१) | due to the process of whirling |
| उज्झित-पट्टसूत्र-नेत्रावृतिम् | उज्झित (√उझ्झ्+क्त)–पट्टसूत्र–नेत्र–आवृति (२.१) | the state of having its silken-thread-net covering removed |
| मुञ्चति | मुञ्चति (√मुच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | releases |
| शोणिमानम् | शोणिमन् (२.१) | redness |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बा | ले | न | न | क्तं | स | म | ये | न | मु | क्तं |
| रौ | प्यं | ल | स | द्बि | म्ब | मि | वे | न्दु | बि | म्बम् |
| भ्र | मि | क्र | मा | दु | ज्झि | त | प | ट्ट | सू | त्र |
| ने | त्रा | वृ | तिं | मु | ञ्च | ति | शो | णि | मा | नम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.