आदत्त दीप्रं मणिमम्बरस्य
दत्त्वा यदस्मै खलु सायधूर्तः ।
रज्यत्तुषारद्युतिकूटहेम
तत्पाण्डु जातं रजतं क्षणेन ॥
आदत्त दीप्रं मणिमम्बरस्य
दत्त्वा यदस्मै खलु सायधूर्तः ।
रज्यत्तुषारद्युतिकूटहेम
तत्पाण्डु जातं रजतं क्षणेन ॥
दत्त्वा यदस्मै खलु सायधूर्तः ।
रज्यत्तुषारद्युतिकूटहेम
तत्पाण्डु जातं रजतं क्षणेन ॥
अन्वयः
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सायधूर्तः खलु अस्मै (चन्द्राय) यत् रज्यत्-तुषार-द्युति-कूट-हेम दत्त्वा अम्बरस्य दीप्रं मणिं (सूर्यम्) आदत्त, तत् (कूटहेम) क्षणेन पाण्डु रजतं जातम्।
Summary
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The rogue of the evening (twilight), having given the moon counterfeit gold in the form of its initial reddish glow, took in exchange the shining gem of the sky, the sun. Indeed, that counterfeit gold quickly turned into pale silver as the moon became white.
पदच्छेदः
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| आदत्त | आदत्त (आ+अ√दा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | took |
| दीप्रम् | दीप्र (२.१) | shining |
| मणिम् | मणि (२.१) | gem |
| अम्बरस्य | अम्बर (६.१) | of the sky |
| दत्त्वा | दत्त्वा (√दा+क्त्वा) | having given |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| अस्मै | इदम् (४.१) | to him |
| खलु | खलु | indeed |
| सायधूर्तः | साय–धूर्त (१.१) | the rogue of the evening |
| रज्यत्-तुषार-द्युति-कूट-हेम | रज्यत् (√रञ्ज्+शतृ)–तुषार–द्युति–कूट–हेम (१.१) | the counterfeit gold of the reddening moon |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| पाण्डु | पाण्डु (१.१) | pale |
| जातम् | जात (√जन्+क्त, १.१) | became |
| रजतम् | रजत (१.१) | silver |
| क्षणेन | क्षण (३.१) | in a moment |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | द | त्त | दी | प्रं | म | णि | म | म्ब | र | स्य |
| द | त्त्वा | य | द | स्मै | ख | लु | सा | य | धू | र्तः |
| र | ज्य | त्तु | षा | र | द्यु | ति | कू | ट | हे | म |
| त | त्पा | ण्डु | जा | तं | र | ज | तं | क्ष | णे | न |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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