पक्वं महाकालफलं किलासी-
त्प्रत्यग्गिरेः सानुनि भानुबिम्बम् ।
भिन्नस्य तस्यैव दृषन्निपाता-
द्बीजानि जानामितमां तमांसि ॥
पक्वं महाकालफलं किलासी-
त्प्रत्यग्गिरेः सानुनि भानुबिम्बम् ।
भिन्नस्य तस्यैव दृषन्निपाता-
द्बीजानि जानामितमां तमांसि ॥
त्प्रत्यग्गिरेः सानुनि भानुबिम्बम् ।
भिन्नस्य तस्यैव दृषन्निपाता-
द्बीजानि जानामितमां तमांसि ॥
अन्वयः
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प्रत्यक्-गिरेः सानुनि भानुबिम्बम् पक्वम् महाकालफलम् किल आसीत् । दृषत्-निपातात् भिन्नस्य तस्य एव बीजानि तमांसि (इति) तमाम् जानामि ।
Summary
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The sun's disc on the western mountain's peak was indeed like a ripe Mahakala fruit. I fully believe that the spreading darknesses are the seeds of that very fruit, which has been shattered by falling on a stone (the horizon).
पदच्छेदः
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| पक्वम् | पक्व (√पच्+क्त, १.१) | ripe |
| महाकालफलम् | महा–काल–फल (१.१) | Mahakala fruit |
| किल | किल | indeed |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| प्रत्यग्गिरेः | प्रत्यच्–गिरि (६.१) | of the western mountain |
| सानुनि | सानु (७.१) | on the peak |
| भानुबिम्बम् | भानु–बिम्ब (१.१) | the disc of the sun |
| भिन्नस्य | भिन्न (√भिद्+क्त, ६.१) | of the shattered |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| एव | एव | very |
| दृषन्निपातात् | दृषद्–निपात (५.१) | from falling on a stone |
| बीजानि | बीज (२.३) | the seeds |
| जानामि | जानामि (√ज्ञा कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I know |
| तमाम् | तमाम् | fully/exceedingly |
| तमांसि | तमस् (२.३) | the darknesses |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | क्वं | म | हा | का | ल | फ | लं | कि | ला | सी |
| त्प्र | त्य | ग्गि | रेः | सा | नु | नि | भा | नु | बि | म्बम् |
| भि | न्न | स्य | त | स्यै | व | दृ | ष | न्नि | पा | ता |
| द्बी | जा | नि | जा | ना | मि | त | मां | त | मां | सि |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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