इत्थं ह्रिया वर्णनजन्मनेव
संध्यामपक्रान्तवतीं प्रतीत्य ।
तारातमोदन्तुरमन्तरिक्षं
निरीक्षमाणः स पुनर्बभाषे ॥
इत्थं ह्रिया वर्णनजन्मनेव
संध्यामपक्रान्तवतीं प्रतीत्य ।
तारातमोदन्तुरमन्तरिक्षं
निरीक्षमाणः स पुनर्बभाषे ॥
संध्यामपक्रान्तवतीं प्रतीत्य ।
तारातमोदन्तुरमन्तरिक्षं
निरीक्षमाणः स पुनर्बभाषे ॥
अन्वयः
AI
सः इत्थम् वर्णन-जन्मना ह्रिया इव अपक्रान्तवतीम् संध्याम् प्रतीत्य, तारा-तमः-दन्तुरम् अन्तरिक्षम् निरीक्षमाणः पुनः बभाषे।
Summary
AI
Realizing that the evening twilight had departed, as if out of shame born from his descriptions, Nala, watching the sky now uneven with stars and darkness, spoke again.
पदच्छेदः
AI
| इत्थम् | इत्थम् | Thus |
| ह्रिया | ह्री (३.१) | with shame |
| वर्णन | वर्णन | description |
| जन्मना | जन्मन् (३.१) | born from |
| इव | इव | as if |
| संध्याम् | संध्या (२.१) | the evening twilight |
| अपक्रान्तवतीम् | अपक्रान्तवत् (अप√क्रम्+क्तवतु, २.१) | who had departed |
| प्रतीत्य | प्रतीत्य (प्रति√इ+ल्यप्) | having realized |
| तारा | तारा | with stars |
| तमः | तमस् | and darkness |
| दन्तुरम् | दन्तुर (२.१) | uneven |
| अन्तरिक्षम् | अन्तरिक्ष (२.१) | the sky |
| निरीक्षमाणः | निरीक्षमाण (निस्√ईक्ष्+शानच्, १.१) | watching |
| सः | तद् (१.१) | He (Nala) |
| पुनः | पुनर् | again |
| बभाषे | बभाषे (√भाष् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | spoke |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्थं | ह्रि | या | व | र्ण | न | ज | न्म | ने | व |
| सं | ध्या | म | प | क्रा | न्त | व | तीं | प्र | ती | त्य |
| ता | रा | त | मो | द | न्तु | र | म | न्त | रि | क्षं |
| नि | री | क्ष | मा | णः | स | पु | न | र्ब | भा | षे |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.