ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया
प्राज्ञंमन्यमना हठेन पठिती मास्मिन्खलः खेलतु ।
श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासादय-
त्वेतत्काव्यरसोर्मिमज्जनसुखव्यासज्जनं सज्जनः ॥
ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया
प्राज्ञंमन्यमना हठेन पठिती मास्मिन्खलः खेलतु ।
श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासादय-
त्वेतत्काव्यरसोर्मिमज्जनसुखव्यासज्जनं सज्जनः ॥
प्राज्ञंमन्यमना हठेन पठिती मास्मिन्खलः खेलतु ।
श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासादय-
त्वेतत्काव्यरसोर्मिमज्जनसुखव्यासज्जनं सज्जनः ॥
अन्वयः
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इह क्वचित् क्वचित् अपि मया प्रयत्नात् ग्रन्थग्रन्थिः न्यसि। प्राज्ञंमन्यमनाः खलः हठेन पठिती अस्मिन् मा खेलतु। श्रद्धा-आराद्ध-गुरु-श्लथीकृत-दृढग्रन्थिः सज्जनः एतत्-काव्य-रस-ऊर्मि-मज्जन-सुख-व्यासज्जनं समासादयतु।
Summary
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Here and there in this work, I have deliberately placed difficult passages. Let not the malicious reader, who considers himself wise, trifle with this work by reading it obstinately. But let the virtuous person, who has had these firm knots untied by a revered teacher, attain the deep pleasure of immersing himself in the waves of this poem's aesthetic essence.
पदच्छेदः
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| ग्रन्थग्रन्थिः | ग्रन्थ–ग्रन्थि (१.१) | a knot in the text |
| इह | इह | here |
| क्वचित् | क्वचित् | somewhere |
| क्वचित् | क्वचित् | somewhere |
| अपि | अपि | also |
| न्यासि | न्यासि (नि√अस् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was placed |
| प्रयत्नात् | प्रयत्न (५.१) | deliberately |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| प्राज्ञंमन्यमनाः | प्राज्ञंमन्य–मनस् (१.१) | one whose mind thinks itself wise |
| हठेन | हठ (३.१) | forcefully |
| पठिती | पठितृ (१.१) | a reader |
| मा | मा | do not |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| खलः | खल (१.१) | a wicked person |
| खेलतु | खेलतु (√खेल् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let him trifle |
| श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः | श्रद्धा–आराद्ध (आ√आराद्ध+क्त)–गुरु–श्लथीकृत (√श्लथीकृत+क्त+च्वि)–दृढ–ग्रन्थि (१.१) | one for whom the firm knots have been loosened by a teacher worshipped with faith |
| समासादयतु | समासादयतु (सम्+आ√सद् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let him attain |
| एतत्काव्यरसोर्मिमज्जनसुखव्यासज्जनम् | एतत्–काव्य–रस–ऊर्मि–मज्जन–सुख–व्यासज्जन (२.१) | the engagement in the pleasure of immersion in the waves of the aesthetic flavor of this poem |
| सज्जनः | सज्जन (१.१) | a virtuous person |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्र | न्थ | ग्र | न्थि | रि | ह | क्व | चि | त्क्व | चि | द | पि | न्या | सि | प्र | य | त्ना | न्म | या |
| प्रा | ज्ञं | म | न्य | म | ना | ह | ठे | न | प | ठि | ती | मा | स्मि | न्ख | लः | खे | ल | तु |
| श्र | द्धा | रा | द्ध | गु | रु | श्ल | थी | कृ | त | दृ | ढ | ग्र | न्थिः | स | मा | सा | द | य |
| त्वे | त | त्का | व्य | र | सो | र्मि | म | ज्ज | न | सु | ख | व्या | स | ज्ज | नं | स | ज्ज | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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