दिशि दिशि गिरिग्रावाणः स्वां वमन्तु सरस्वतीं
तुलयतु मिथस्तामापातस्फुरद्ध्वनिडम्बराम् ।
स परमपरः क्षीरोदन्वान्यदीयमुदीयते
मथितुरमृतं खेदच्छेदि प्रमोदनमोदनम् ॥
दिशि दिशि गिरिग्रावाणः स्वां वमन्तु सरस्वतीं
तुलयतु मिथस्तामापातस्फुरद्ध्वनिडम्बराम् ।
स परमपरः क्षीरोदन्वान्यदीयमुदीयते
मथितुरमृतं खेदच्छेदि प्रमोदनमोदनम् ॥
तुलयतु मिथस्तामापातस्फुरद्ध्वनिडम्बराम् ।
स परमपरः क्षीरोदन्वान्यदीयमुदीयते
मथितुरमृतं खेदच्छेदि प्रमोदनमोदनम् ॥
अन्वयः
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दिशि दिशि गिरिग्रावाणः स्वां सरस्वतीं वमन्तु। मिथः आपातस्फुरद्ध्वनिडम्बरां तां तुलयतु। सः अपरः क्षीरोदन्वान् परम्, यदीयं खेदच्छेदि प्रमोदनमोदनम् अमृतं मथितुः उदीयते।
Summary
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Let the mountain-like poets in every direction spew forth their own poetry. Let their work, with its superficial glitter of suggested meaning, be compared amongst themselves. But that other one is the supreme Ocean of Milk (my poem), from which arises for the discerning reader nectar that cuts away sorrow and delights even the joyful.
पदच्छेदः
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| दिशि | दिश् (७.१) | in direction |
| दिशि | दिश् (७.१) | in direction |
| गिरिग्रावाणः | गिरि–ग्रावन् (१.३) | mountain rocks (other poets) |
| स्वाम् | स्व (२.१) | their own |
| वमन्तु | वमन्तु (√वम् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | let them spew forth |
| सरस्वतीम् | सरस्वती (२.१) | poetry |
| तुलयतु | तुलयतु (√तुल् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let one compare |
| मिथः | मिथस् | mutually |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| आपातस्फुरद्ध्वनिडम्बराम् | आपात–स्फुरत् (√स्फुरत्+शतृ)–ध्वनि–डम्बर (२.१) | which has a pomp of suggested meaning that glitters only at first glance |
| सः | तद् (१.१) | That |
| परम् | परम् | but |
| अपरः | अपर (१.१) | another |
| क्षीरोदन्वान् | क्षीर–उदन्वत् (१.१) | the ocean of milk |
| यदीयम् | यदीय (२.१) | whose |
| उदीयते | उदीयते (उद्√इ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | arises |
| मथितुः | मथितृ (६.१) | of the churner (discerning reader) |
| अमृतम् | अमृत (२.१) | nectar |
| खेदच्छेदि | खेद–छेदिन् (२.१) | that which cuts away sorrow |
| प्रमोदनमोदनम् | प्रमोदन–मोदन (२.१) | that which delights the joyful |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | शि | दि | शि | गि | रि | ग्रा | वा | णः | स्वां | व | म | न्तु | स | र | स्व | तीं |
| तु | ल | य | तु | मि | थ | स्ता | मा | पा | त | स्फु | र | द्ध्व | नि | ड | म्ब | राम् |
| स | प | र | म | प | रः | क्षी | रो | द | न्वा | न्य | दी | य | मु | दी | य | ते |
| म | थि | तु | र | मृ | तं | खे | द | च्छे | दि | प्र | मो | द | न | मो | द | नम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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