ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरा-
द्यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदार्णवम् ।
यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः
श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याभ्युदीयादियम् ॥
ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरा-
द्यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदार्णवम् ।
यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः
श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याभ्युदीयादियम् ॥
द्यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदार्णवम् ।
यत्काव्यं मधुवर्षि धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः
श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याभ्युदीयादियम् ॥
अन्वयः
AI
यः कान्यकुब्जेश्वरात् ताम्बूलद्वयम् आसनं च लभते, यः समाधिषु प्रमोदार्णवं परं ब्रह्म साक्षात्कुरुते, यस्य काव्यं मधुवर्षि, यस्य उक्तयः तर्केषु धर्षितपराः, तस्य श्रीश्रीहर्षकवेः इयं कृतिः कृतिमुदे अभ्युदीयात्।
Summary
AI
May this work of the poet Śrī Śrīharṣa—who receives the honor of betel leaves and a seat from the king of Kanyakubja, who realizes the supreme Brahman, an ocean of bliss, in meditation, whose poetry rains honey, and whose arguments in logical debates have vanquished opponents—rise for the delight of the learned.
पदच्छेदः
AI
| ताम्बूलद्वयम् | ताम्बूल–द्वय (२.१) | a pair of betel leaves |
| आसनम् | आसन (२.१) | a seat |
| च | च | and |
| लभते | लभते (√लभ् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | receives |
| यः | यद् (१.१) | who |
| कान्यकुब्जेश्वरात् | कान्यकुब्ज–ईश्वर (५.१) | from the king of Kanyakubja |
| यः | यद् (१.१) | who |
| साक्षात्कुरुते | साक्षात्कुरुते (√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | realizes directly |
| समाधिषु | समाधि (७.३) | in states of deep meditation |
| परम् | पर (२.१) | the supreme |
| ब्रह्म | ब्रह्मन् (२.१) | Brahman |
| प्रमोदार्णवम् | प्रमोद–अर्णव (२.१) | an ocean of bliss |
| यत्काव्यम् | यद्–काव्य (१.१) | whose poetry |
| मधुवर्षि | मधु–वर्षिन् (१.१) | is raining honey |
| धर्षितपराः | धर्षित (√धर्षित+णिच्+क्त)–पर (१.३) | which have vanquished opponents |
| तर्केषु | तर्क (७.३) | in logical debates |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| उक्तयः | उक्ति (१.३) | sayings |
| श्रीश्रीहर्षकवेः | श्री–श्रीहर्ष–कवि (६.१) | of the poet Śrī Śrīharṣa |
| कृतिः | कृति (१.१) | work |
| कृतिमुदे | कृतिन्–मुद् (४.१) | for the delight of the learned |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| अभ्युदीयात् | अभ्युदीयात् (अभि+उद्√इ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it rise |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | म्बू | ल | द्व | य | मा | स | नं | च | ल | भ | ते | यः | का | न्य | कु | ब्जे | श्व | रा |
| द्यः | सा | क्षा | त्कु | रु | ते | स | मा | धि | षु | प | रं | ब्र | ह्म | प्र | मो | दा | र्ण | वम् |
| य | त्का | व्यं | म | धु | व | र्षि | ध | र्षि | त | प | रा | स्त | र्के | षु | य | स्यो | क्त | यः |
| श्री | श्री | ह | र्ष | क | वेः | कृ | तिः | कृ | ति | मु | दे | त | स्या | भ्यु | दी | या | दि | यम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.