श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
द्वाविंशो नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतोऽयं महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
द्वाविंशो नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतोऽयं महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
द्वाविंशो नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतोऽयं महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयं यं सुतं श्रीहर्षं सुषुवे, तस्य कृतौ नवसाहसाङ्कचरिते नलीयचरिते महाकाव्ये अयं निसर्गोज्ज्वलः द्वाविंशः सर्गः चम्पूकृतः (अस्ति)।
Summary
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Śrīhīra, a diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings, and Māmalladevī gave birth to their son, Śrīharṣa, who had conquered his senses. In his creation, the great epic poem Naishadhiyacharitam, also called the new Sāhasāṅka-carita, this naturally brilliant twenty-second canto has been completed.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Śrīharṣa |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Śrīhīra |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जित (√जित+क्त)–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who has conquered the group of senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Māmalladevī |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| द्वाविंशः | द्वाविंश (१.१) | the twenty-second |
| नवसाहसाङ्कचरिते | नवसाहसाङ्कचरित (७.१) | in the new Sāhasāṅka-carita |
| चम्पूकृतः | चम्पूकृत (√कृ+क्त+च्वि, १.१) | is completed |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| कृतौ | कृति (७.१) | in the work of |
| नलीयचरिते | नलीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharitam |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्गोज्ज्वलः | निसर्ग–उज्ज्वल (१.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| द्वा | विं | शो | न | व | सा | ह | सा | ङ्क | च | रि | ते | च | म्पू | कृ | तो | ऽयं | म | हा |
| का | व्ये | त | स्य | कृ | तौ | न | ली | य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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