आस्यं शीतमयूखमण्डलगुणानाकृष्य ते निर्मितं
शङ्के सुन्दरि शर्वरीपरिवृढस्तेनैष दोषाकरः ।
आदायेन्दुमृगादपीह निहिते पश्यामि सारं दृशौ
त्वद्वक्त्रे सति वा विधौ धृतिमयं दध्यादनन्धः कुतः ॥
आस्यं शीतमयूखमण्डलगुणानाकृष्य ते निर्मितं
शङ्के सुन्दरि शर्वरीपरिवृढस्तेनैष दोषाकरः ।
आदायेन्दुमृगादपीह निहिते पश्यामि सारं दृशौ
त्वद्वक्त्रे सति वा विधौ धृतिमयं दध्यादनन्धः कुतः ॥
शङ्के सुन्दरि शर्वरीपरिवृढस्तेनैष दोषाकरः ।
आदायेन्दुमृगादपीह निहिते पश्यामि सारं दृशौ
त्वद्वक्त्रे सति वा विधौ धृतिमयं दध्यादनन्धः कुतः ॥
अन्वयः
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सुन्दरि, शङ्के ते आस्यम् शीत-मयूख-मण्डल-गुणान् आकृष्य निर्मितम् । तेन एषः शर्वरी-परिवृढः दोष-आकरः (जातः) । इह इन्दु-मृगात् अपि सारम् आदाय (ते) दृशौ निहिते (इति) पश्यामि । त्वत्-वक्त्रे सति वा विधौ (सति), अनन्धः अयम् कुतः धृतिम् दध्यात्?
Summary
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O beautiful one, I suspect your face was created by extracting all the virtues of the moon's orb, which is why the moon has become a 'mine of faults' (doṣākara). I see that your eyes were formed by taking the very essence from the deer in the moon. When your face exists, how can any person who is not blind hold their composure while looking at the moon?
पदच्छेदः
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| आस्यं | आस्य (१.१) | face |
| शीतमयूखमण्डलगुणान् | शीतमयूखमण्डलगुण (२.३) | the qualities of the cool-rayed orb |
| आकृष्य | आकृष्य (आ√कृष्+ल्यप्) | having drawn |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| निर्मितं | निर्मित (निर्√मा+क्त, १.१) | was created |
| शङ्के | शङ्के (√शङ्क् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I suspect |
| सुन्दरि | सुन्दरी (८.१) | O beautiful one |
| शर्वरीपरिवृढः | शर्वरीपरिवृढ (१.१) | the lord of the night |
| तेन | तद् (३.१) | for that reason |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| दोषाकरः | दोषाकर (१.१) | a mine of faults |
| आदाय | आदाय (आ√दा+ल्यप्) | having taken |
| इन्दुमृगात् | इन्दुमृग (५.१) | from the deer in the moon |
| अपि | अपि | also |
| इह | इह | here |
| निहिते | निहित (नि√धा+क्त, १.२) | were placed |
| पश्यामि | पश्यामि (√दृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I see |
| सारं | सार (२.१) | the essence |
| दृशौ | दृश् (१.२) | two eyes |
| त्वद्वक्त्रे | त्वद्वक्त्र (७.१) | when your face |
| सति | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | exists |
| वा | वा | or |
| विधौ | विधु (७.१) | when the moon |
| धृतिम् | धृति (२.१) | steadfastness |
| अयं | इदम् (१.१) | this (person) |
| दध्यात् | दध्यात् (√धा कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would hold |
| अनन्धः | अनन्ध (१.१) | one who is not blind |
| कुतः | कुतः | how |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | स्यं | शी | त | म | यू | ख | म | ण्ड | ल | गु | णा | ना | कृ | ष्य | ते | नि | र्मि | तं |
| श | ङ्के | सु | न्द | रि | श | र्व | री | प | रि | वृ | ढ | स्ते | नै | ष | दो | षा | क | रः |
| आ | दा | ये | न्दु | मृ | गा | द | पी | ह | नि | हि | ते | प | श्या | मि | सा | रं | दृ | शौ |
| त्व | द्व | क्त्रे | स | ति | वा | वि | धौ | धृ | ति | म | यं | द | ध्या | द | न | न्धः | कु | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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