लावण्येन तवाखिलेन वदनं तत्पात्रमात्रस्पृशा
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण यः ।
तल्लेखापि शिखामणिः सुषमयाहंकृत्य शंभोरभू-
दब्जं तस्य पदं यदस्पृशदतः पद्मं च सन्न श्रियाः ॥
लावण्येन तवाखिलेन वदनं तत्पात्रमात्रस्पृशा
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण यः ।
तल्लेखापि शिखामणिः सुषमयाहंकृत्य शंभोरभू-
दब्जं तस्य पदं यदस्पृशदतः पद्मं च सन्न श्रियाः ॥
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण यः ।
तल्लेखापि शिखामणिः सुषमयाहंकृत्य शंभोरभू-
दब्जं तस्य पदं यदस्पृशदतः पद्मं च सन्न श्रियाः ॥
अन्वयः
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तव वदनम् अखिलेन लावण्येन (आरम्भि) । यः चन्द्रः (अस्ति सः) शेषेण, तत्-पात्र-मात्र-स्पृशा, प्रोञ्छन-लब्ध-तत्-अर्ध-मलिनेन (लावण्येन) आरम्भि । तत्-लेखा अपि सुषमया अहंकृत्य शंभोः शिखामणिः अभूत् । यत् अब्जम् तस्य पदम् अस्पृशत्, अतः पद्मम् च श्रियाः सत् न (अभूत्) ।
Summary
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Your face was made with all the beauty, while the moon was made with the soiled remainder. Yet, even a sliver of it proudly became Shiva's crest-jewel due to its beauty. Because the water-born lotus touched the moon's position (as it is also born from water), the lotus's own beauty was diminished.
पदच्छेदः
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| लावण्येन | लावण्य (३.१) | with beauty |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अखिलेन | अखिल (३.१) | with the entire |
| वदनं | वदन (१.१) | face |
| तत्पात्रमात्रस्पृशा | तत्पात्रमात्रस्पृश् (३.१) | which merely touched that vessel |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेन | प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिन (३.१) | soiled by getting half from wiping |
| आरम्भि | आरम्भि (आ√रभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was created |
| शेषेण | शेष (३.१) | with the remainder |
| यः | यद् (१.१) | which |
| तल्लेखापि | तल्लेखा–अपि | even its digit |
| शिखामणिः | शिखामणि (१.१) | crest-jewel |
| सुषमया | सुषमा (३.१) | with beauty |
| अहंकृत्य | अहंकृत्य (अहम्√कृ+ल्यप्) | having become proud |
| शंभोः | शंभु (६.१) | of Shambhu (Shiva) |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| अब्जं | अब्ज (१.१) | the lotus |
| तस्य | तद् (६.१) | its |
| पदं | पद (२.१) | position |
| यत् | यद् | because |
| अस्पृशत् | अस्पृशत् (√स्पृश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | touched |
| अतः | अतः | therefore |
| पद्मं | पद्म (१.१) | the lotus |
| च | च | and |
| सन्न | सन्न (√सद्+क्त, १.१) | diminished |
| श्रियाः | श्री (५.१) | of beauty |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ला | व | ण्ये | न | त | वा | खि | ले | न | व | द | नं | त | त्पा | त्र | मा | त्र | स्पृ | शा |
| च | न्द्रः | प्रो | ञ्छ | न | ल | ब्ध | ता | र्ध | म | लि | ने | ना | र | म्भि | शे | षे | ण | यः |
| त | ल्ले | खा | पि | शि | खा | म | णिः | सु | ष | म | या | हं | कृ | त्य | शं | भो | र | भू |
| द | ब्जं | त | स्य | प | दं | य | द | स्पृ | श | द | तः | प | द्मं | च | स | न्न | श्रि | याः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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