लावण्येन तवास्यमेव बहुना तत्पात्रमात्रस्पृशा
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण तु ।
निर्माय द्वयमेतदप्सु विधिना पाणी खलु क्षालितौ
तल्लेशैरधुनापि नीरनिलयैरम्भोजमारभ्यते ॥
लावण्येन तवास्यमेव बहुना तत्पात्रमात्रस्पृशा
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण तु ।
निर्माय द्वयमेतदप्सु विधिना पाणी खलु क्षालितौ
तल्लेशैरधुनापि नीरनिलयैरम्भोजमारभ्यते ॥
चन्द्रः प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेनारम्भि शेषेण तु ।
निर्माय द्वयमेतदप्सु विधिना पाणी खलु क्षालितौ
तल्लेशैरधुनापि नीरनिलयैरम्भोजमारभ्यते ॥
अन्वयः
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तव आस्यम् एव बहुना लावण्येन (आरम्भि) । तु शेषेण, तत्-पात्र-मात्र-स्पृशा, प्रोञ्छन-लब्ध-तत्-अर्ध-मलिनेन (लावण्येन) चन्द्रः आरम्भि । एतत् द्वयम् निर्माय, विधिना अप्सु पाणी खलु क्षालितौ । अधुना अपि नीर-निलयैः तत्-लेशैः अम्भोजम् आरभ्यते ।
Summary
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Your face was created with a great amount of beauty. The moon, however, was created with the remainder, which was soiled by merely touching the vessel and getting half of it from the wiping. After creating this pair, the Creator washed his hands in water. Even now, the lotus is created from those water-borne particles of beauty.
पदच्छेदः
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| लावण्येन | लावण्य (३.१) | with beauty |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| आस्यम् | आस्य (१.१) | face |
| एव | एव | indeed |
| बहुना | बहु (३.१) | with much |
| तत्पात्रमात्रस्पृशा | तत्पात्रमात्रस्पृश् (३.१) | which merely touched that vessel |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिनेन | प्रोञ्छनलब्धतार्धमलिन (३.१) | which was soiled by getting half of that from wiping |
| आरम्भि | आरम्भि (आ√रभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was created |
| शेषेण | शेष (३.१) | with the remainder |
| तु | तु | but |
| निर्माय | निर्माय (निर्√मा+ल्यप्) | having created |
| द्वयम् | द्वय (२.१) | pair |
| एतत् | एतद् (२.१) | this |
| अप्सु | अप् (७.३) | in the water |
| विधिना | विधि (३.१) | by the Creator |
| पाणी | पाणि (१.२) | two hands |
| खलु | खलु | indeed |
| क्षालितौ | क्षालित (√क्षल्+क्त, १.२) | were washed |
| तल्लेशैः | तल्लेश (३.३) | with its particles |
| अधुनापि | अधुना–अपि | even now |
| नीरनिलयैः | नीरनिलय (३.३) | residing in water |
| अम्भोजम् | अम्भोज (१.१) | the lotus |
| आरभ्यते | आरभ्यते (आ√रभ् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is created |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ला | व | ण्ये | न | त | वा | स्य | मे | व | ब | हु | ना | त | त्पा | त्र | मा | त्र | स्पृ | शा |
| च | न्द्रः | प्रो | ञ्छ | न | ल | ब्ध | ता | र्ध | म | लि | ने | ना | र | म्भि | शे | षे | ण | तु |
| नि | र्मा | य | द्व | य | मे | त | द | प्सु | वि | धि | ना | पा | णी | ख | लु | क्षा | लि | तौ |
| त | ल्ले | शै | र | धु | ना | पि | नी | र | नि | ल | यै | र | म्भो | ज | मा | र | भ्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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