ज्योत्स्नामादयते चकोरशिशुना द्राघीयसी लोचने
लिप्सुर्मूलमिवोपजीवितुमितः संतपर्णात्मीकृतात् ।
अङ्के रङ्कुमयं करोति च परिस्प्रष्टुं तदेवादृत-
स्त्वद्वत्त्रं नयनश्रियाप्यनधिकं मुग्धे विधित्सुर्विधुः ॥
ज्योत्स्नामादयते चकोरशिशुना द्राघीयसी लोचने
लिप्सुर्मूलमिवोपजीवितुमितः संतपर्णात्मीकृतात् ।
अङ्के रङ्कुमयं करोति च परिस्प्रष्टुं तदेवादृत-
स्त्वद्वत्त्रं नयनश्रियाप्यनधिकं मुग्धे विधित्सुर्विधुः ॥
लिप्सुर्मूलमिवोपजीवितुमितः संतपर्णात्मीकृतात् ।
अङ्के रङ्कुमयं करोति च परिस्प्रष्टुं तदेवादृत-
स्त्वद्वत्त्रं नयनश्रियाप्यनधिकं मुग्धे विधित्सुर्विधुः ॥
अन्वयः
AI
मुग्धे, विधुः ते लोचने द्राघीयसी (कर्तुम्), चकोर-शिशुना ज्योत्स्नाम् आदाय, इतः संतर्पण-आत्मी-कृतात् मूलम् उपजीवितुम् लिप्सुः इव (अस्ति) । अयम् विधुः अङ्के रङ्कुम् करोति, आदृतः (सन्) तत् एव परिस्प्रष्टुम् (इच्छति) । (किञ्च) नयन-श्रिया अपि अनधिकम् त्वत्-वक्त्रम् विधित्सुः (अस्ति) ।
Summary
AI
O charming one, the moon, using the young Chakora bird, takes your moonlight-like eyes to make them longer, desiring to live off this satisfying gain as if it were capital. It places a deer in its lap, eager to touch it, wishing to create your face, which is not surpassed even by the beauty of the deer's eyes.
पदच्छेदः
AI
| ज्योत्स्नाम् | ज्योत्स्ना (२.१) | moonlight |
| आदयते | आदयते (आ√दा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | takes |
| चकोरशिशुना | चकोरशिशु (३.१) | with the young Chakora bird |
| द्राघीयसी | द्राघीयस् (२.२) | longer |
| लोचने | लोचन (२.२) | eyes |
| लिप्सुः | लिप्सु (√लभ्+सन्+उ, १.१) | desirous of obtaining |
| मूलम् | मूल (२.१) | the principal (capital) |
| इव | इव | like |
| उपजीवितुम् | उपजीवितुम् (उप√जीव्+तुमुन्) | to live upon |
| इतः | इतः | from this |
| संतर्पणात्मीकृतात् | संतर्पणात्मीकृत (५.१) | from what has been made its own by satisfying |
| अङ्के | अङ्क (७.१) | in its lap |
| रङ्कुम् | रङ्कु (२.१) | a deer |
| अयम् | इदम् (१.१) | this (moon) |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | places |
| च | च | and |
| परिस्प्रष्टुं | परिस्प्रष्टुं (परि√स्पृश्+तुमुन्) | to touch |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| एव | एव | very |
| आदृतः | आदृत (आ√दृ+क्त, १.१) | respected |
| त्वद्वक्त्रं | त्वद्वक्त्र (२.१) | your face |
| नयनश्रियापि | नयनश्री (३.१)–अपि | even by the beauty of the eyes |
| अनधिकं | अनधिक (२.१) | not superior |
| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O charming one |
| विधित्सुः | विधित्सु (वि√धा+सन्+उ, १.१) | wishing to make |
| विधुः | विधु (१.१) | the moon |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज्यो | त्स्ना | मा | द | य | ते | च | को | र | शि | शु | ना | द्रा | घी | य | सी | लो | च | ने |
| लि | प्सु | र्मू | ल | मि | वो | प | जी | वि | तु | मि | तः | सं | त | प | र्णा | त्मी | कृ | तात् |
| अ | ङ्के | र | ङ्कु | म | यं | क | रो | ति | च | प | रि | स्प्र | ष्टुं | त | दे | वा | दृ | त |
| स्त्व | द्व | त्त्रं | न | य | न | श्रि | या | प्य | न | धि | कं | मु | ग्धे | वि | धि | त्सु | र्वि | धुः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.