जातं शातक्रतव्यां हरिति विहरतः काकतालीयमस्या-
मश्यामत्वैकमत्यस्थितसकलकलानिर्मितेर्निर्मलस्य ।
इन्दोरिन्दीवराभं बलविजयिगजग्रामणीगण्डपिण्ड-
द्वन्द्वापादानदानद्रवलवलगनादङ्कमङ्के विशङ्के ॥
जातं शातक्रतव्यां हरिति विहरतः काकतालीयमस्या-
मश्यामत्वैकमत्यस्थितसकलकलानिर्मितेर्निर्मलस्य ।
इन्दोरिन्दीवराभं बलविजयिगजग्रामणीगण्डपिण्ड-
द्वन्द्वापादानदानद्रवलवलगनादङ्कमङ्के विशङ्के ॥
मश्यामत्वैकमत्यस्थितसकलकलानिर्मितेर्निर्मलस्य ।
इन्दोरिन्दीवराभं बलविजयिगजग्रामणीगण्डपिण्ड-
द्वन्द्वापादानदानद्रवलवलगनादङ्कमङ्के विशङ्के ॥
अन्वयः
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शातक्रतव्याम् हरिति विहरतः, अस्याम् श्यामत्व-एकमत्य-स्थित-सकल-कला-निर्मितेः निर्मलस्य इन्दोः अङ्के इन्दीवर-आभम् अङ्कम्, बल-विजयि-गज-ग्रामणी-गण्ड-पिण्ड-द्वन्द्व-अपादान-दान-द्रव-लव-लगनात् काकतालीयम् जातम् (इति) विशङ्के ।
Summary
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I suspect that the blue-lotus-like mark on the surface of the spotless moon—whose every digit is created to be bright—appeared by sheer accident. It likely came from a tiny drop of ichor from the cheeks of Indra's elephant, Airavata, sticking to it as the moon wandered in Indra's eastern quarter.
पदच्छेदः
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| जातम् | जात (√जन्+क्त, १.१) | happened |
| शातक्रतव्यां | शातक्रतवी (७.१) | of Indra |
| हरिति | हरित् (७.१) | in the direction (eastern) |
| विहरतः | विहरत् (वि√हृ+शतृ, ६.१) | of the one wandering |
| काकतालीयम् | काकतालीय (१.१) | by a sheer accident |
| अस्याम् | इदम् (७.१) | in this |
| अश्यामत्वैकमत्यस्थितसकलकलानिर्मितेः | अश्यामत्वैकमत्यस्थितसकलकलानिर्मिति (६.१) | of the one whose every digit is created with the consensus of being not dark |
| निर्मलस्य | निर्मल (६.१) | of the spotless |
| इन्दोः | इन्दु (६.१) | of the moon |
| इन्दीवराभं | इन्दीवराभ (२.१) | resembling a blue lotus |
| बलविजयिगजग्रामणीगण्डपिण्डद्वन्द्वापादानदानद्रवलवलगनात् | बलविजयिगजग्रामणीगण्डपिण्डद्वन्द्वापादानदानद्रवलवलगन (५.१) | from the sticking of a tiny drop of the ichor fluid taken from the pair of cheek-globes of the chief elephant of the conqueror of Bala (Indra's Airavata) |
| अङ्कम् | अङ्क (१.१) | the mark |
| अङ्के | अङ्क (७.१) | on the surface |
| विशङ्के | विशङ्के (वि√शङ्क् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I suspect |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जा | तं | शा | त | क्र | त | व्यां | ह | रि | ति | वि | ह | र | तः | का | क | ता | ली | य | म | स्या |
| म | श्या | म | त्वै | क | म | त्य | स्थि | त | स | क | ल | क | ला | नि | र्मि | ते | र्नि | र्म | ल | स्य |
| इ | न्दो | रि | न्दी | व | रा | भं | ब | ल | वि | ज | यि | ग | ज | ग्रा | म | णी | ग | ण्ड | पि | ण्ड |
| द्व | न्द्वा | पा | दा | न | दा | न | द्र | व | ल | व | ल | ग | ना | द | ङ्क | म | ङ्के | वि | श | ङ्के |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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