सागरान्मुनिविलोचनोदरा-
द्यद्द्वयादजनि तेन किं द्विजः ।
एवमेव च भवन्नयं द्विजः
पर्यवस्यति विधुः किमत्रिजः ॥
सागरान्मुनिविलोचनोदरा-
द्यद्द्वयादजनि तेन किं द्विजः ।
एवमेव च भवन्नयं द्विजः
पर्यवस्यति विधुः किमत्रिजः ॥
द्यद्द्वयादजनि तेन किं द्विजः ।
एवमेव च भवन्नयं द्विजः
पर्यवस्यति विधुः किमत्रिजः ॥
अन्वयः
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(अयम् विधुः) सागरात् मुनि-विलोचन-उदरात् च यत् द्वयात् अजनि, तेन किम् (अयम्) द्विजः (भवति)? एवम् एव च अयम् द्विजः भवन्, विधुः किम् अत्रिजः (इति) पर्यवस्यति?
Summary
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The moon is called 'dvija' (twice-born) because it was born from two sources: the ocean and the eye of sage Atri. Does this fact that it is 'dvija' not confirm that this moon is indeed born of Atri?
पदच्छेदः
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| सागरात् | सागर (५.१) | from the ocean |
| मुनिविलोचनोदरात् | मुनि–विलोचन–उदर (५.१) | from the sage's eye |
| यत् | यद् | that/because |
| द्वयात् | द्वय (५.१) | from a pair |
| अजनि | अजनि (√जन् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was born |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| किम् | किम् | is it that? |
| द्विजः | द्विज (१.१) | twice-born |
| एवमेव | एवम्–एव | in this very way |
| च | च | and |
| भवन् | भवत् (√भू+शतृ, १.१) | being |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| द्विजः | द्विज (१.१) | twice-born |
| पर्यवस्यति | पर्यवस्यति (परि+अव√सो कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | it concludes |
| विधुः | विधु (१.१) | the moon |
| किम् | किम् | is it that? |
| अत्रिजः | अत्रि–ज (१.१) | born of Atri |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | ग | रा | न्मु | नि | वि | लो | च | नो | द | रा |
| द्य | द्द्व | या | द | ज | नि | ते | न | किं | द्वि | जः |
| ए | व | मे | व | च | भ | व | न्न | यं | द्वि | जः |
| प | र्य | व | स्य | ति | वि | धुः | कि | म | त्रि | जः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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