आदाय दण्डं सकलासु दिक्षु
योऽयं परिभ्राम्यति भानुभिक्षुः ।
अब्धौ निमज्जन्निव तापसोऽयं
संध्याभ्रकाषायमधत्त सायम् ॥
आदाय दण्डं सकलासु दिक्षु
योऽयं परिभ्राम्यति भानुभिक्षुः ।
अब्धौ निमज्जन्निव तापसोऽयं
संध्याभ्रकाषायमधत्त सायम् ॥
योऽयं परिभ्राम्यति भानुभिक्षुः ।
अब्धौ निमज्जन्निव तापसोऽयं
संध्याभ्रकाषायमधत्त सायम् ॥
अन्वयः
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यः अयम् भानु-भिक्षुः दण्डम् आदाय सकलासु दिक्षु परिभ्राम्यति, अयम् तापसः सायम् अब्धौ निमज्जन् इव संध्या-अभ्र-काषायम् अधत्त।
Summary
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This sun-mendicant, who wanders in all directions carrying his staff of rays, this ascetic, as if sinking into the ocean in the evening, has put on the saffron robe of the evening clouds.
पदच्छेदः
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| आदाय | आदाय (आ√दा+ल्यप्) | Having taken |
| दण्डम् | दण्ड (२.१) | the staff (of rays) |
| सकलासु | सकल (७.३) | in all |
| दिक्षु | दिश् (७.३) | directions |
| यः | यद् (१.१) | who |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| परिभ्राम्यति | परिभ्राम्यति (परि√भ्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wanders |
| भानु | भानु | sun |
| भिक्षुः | भिक्षु (१.१) | mendicant |
| अब्धौ | अब्धि (७.१) | in the ocean |
| निमज्जन् | निमज्जत् (नि√मस्ज्+शतृ, १.१) | sinking |
| इव | इव | as if |
| तापसः | तापस (१.१) | ascetic |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| संध्या | संध्या | evening |
| अभ्र | अभ्र | cloud |
| काषायम् | काषाय (२.१) | saffron robe |
| अधत्त | अधत्त (√धा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | put on |
| सायम् | सायम् | in the evening |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | दा | य | द | ण्डं | स | क | ला | सु | दि | क्षु |
| यो | ऽयं | प | रि | भ्रा | म्य | ति | भा | नु | भि | क्षुः |
| अ | ब्धौ | नि | म | ज्ज | न्नि | व | ता | प | सो | ऽयं |
| सं | ध्या | भ्र | का | षा | य | म | ध | त्त | सा | यम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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