दूरेऽपि तत्तावकगानपाना-
ल्लब्धावधिः स्वादुरसोपभोगे ।
अवज्ञयैव क्षिपति क्षपायाः
पतिः खलु स्वान्यमृतानि भासः ॥
दूरेऽपि तत्तावकगानपाना-
ल्लब्धावधिः स्वादुरसोपभोगे ।
अवज्ञयैव क्षिपति क्षपायाः
पतिः खलु स्वान्यमृतानि भासः ॥
ल्लब्धावधिः स्वादुरसोपभोगे ।
अवज्ञयैव क्षिपति क्षपायाः
पतिः खलु स्वान्यमृतानि भासः ॥
अन्वयः
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क्षपायाः पतिः (चन्द्रः) दूरे अपि तत् तावक-गान-पानात् स्वादु-रस-उपभोगे लब्ध-अवधिः (सन्) भासः स्वानि अमृतानि अवज्ञया एव क्षिपति खलु ।
Summary
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The lord of the night (the moon), having reached the pinnacle of enjoying sweet essence by drinking your song even from afar, indeed scatters his own nectars—his rays—with mere contempt, as if they are inferior.
पदच्छेदः
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| दूरे | दूर (७.१) | at a distance |
| अपि | अपि | even |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| तावक | तावक | your |
| गान | गान | song |
| पानात् | पान (५.१) | from drinking |
| लब्ध | लब्ध (√लभ्+क्त) | obtained |
| अवधिः | अवधि (१.१) | whose limit |
| स्वादु | स्वादु | sweet |
| रस | रस | essence |
| उपभोगे | उपभोग (७.१) | in the enjoyment of |
| अवज्ञया | अवज्ञा (३.१) | with contempt |
| एव | एव | indeed |
| क्षिपति | क्षिपति (√क्षिप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | scatters |
| क्षपायाः | क्षपा (६.१) | of the night |
| पतिः | पति (१.१) | the lord |
| खलु | खलु | indeed |
| स्वानि | स्व (२.३) | his own |
| अमृतानि | अमृत (२.३) | nectars |
| भासः | भास् (२.३) | rays |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दू | रे | ऽपि | त | त्ता | व | क | गा | न | पा | ना |
| ल्ल | ब्धा | व | धिः | स्वा | दु | र | सो | प | भो | गे |
| अ | व | ज्ञ | यै | व | क्षि | प | ति | क्ष | पा | याः |
| प | तिः | ख | लु | स्वा | न्य | मृ | ता | नि | भा | सः |
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