आप्यायनाद्वा रुचिभिः सुधांशोः
शैत्यात्तमःकाननजन्मनो वा ।
यावन्निशायामथ घर्मदुःस्थ-
स्तावद्व्रजत्यह्नि न शब्दपान्थः ॥
आप्यायनाद्वा रुचिभिः सुधांशोः
शैत्यात्तमःकाननजन्मनो वा ।
यावन्निशायामथ घर्मदुःस्थ-
स्तावद्व्रजत्यह्नि न शब्दपान्थः ॥
शैत्यात्तमःकाननजन्मनो वा ।
यावन्निशायामथ घर्मदुःस्थ-
स्तावद्व्रजत्यह्नि न शब्दपान्थः ॥
अन्वयः
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अथ शब्द-पान्थः निशायाम् सुधांशोः रुचिभिः आप्यायनात् वा तमः-कानन-जन्मनः शैत्यात् वा यावत् घर्म-दुःस्थः न (भवति), तावत् अह्नि न व्रजति ।
Summary
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The cātaka bird, a traveler of sound, does not travel during the day as long as it is not afflicted by heat. This is because at night, it is refreshed either by the nourishing rays of the moon or by the coolness born from the forest of darkness.
पदच्छेदः
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| आप्यायनात् | आप्यायन (५.१) | from being refreshed |
| वा | वा | or |
| रुचिभिः | रुचि (३.३) | by the rays |
| सुधांशोः | सुधांशु (६.१) | of the moon |
| शैत्यात् | शैत्य (५.१) | from the coolness |
| तमः | तमस् | darkness |
| कानन | कानन | forest |
| जन्मनः | जन्मन् (५.१) | born from |
| वा | वा | or |
| यावत् | यावत् | as long as |
| निशायाम् | निशा (७.१) | in the night |
| अथ | अथ | therefore |
| घर्म | घर्म | by heat |
| दुःस्थः | दुःस्थ (१.१) | afflicted |
| तावत् | तावत् | so long |
| व्रजति | व्रजति (√व्रज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | travels |
| अह्नि | अहन् (७.१) | in the day |
| न | न | not |
| शब्द | शब्द | sound |
| पान्थः | पान्थ (१.१) | traveler |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | प्या | य | ना | द्वा | रु | चि | भिः | सु | धां | शोः |
| शै | त्या | त्त | मः | का | न | न | ज | न्म | नो | वा |
| या | व | न्नि | शा | या | म | थ | घ | र्म | दुः | स्थ |
| स्ता | व | द्व्र | ज | त्य | ह्नि | न | श | ब्द | पा | न्थः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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