तवानने जातचरीं निपीय
गीतिं तदाकर्णनलोलुपोऽयम् ।
हातुं नु जातु स्पृहयत्यवैमि
विधुं मृगस्त्वद्वदनभ्रमेण ॥
तवानने जातचरीं निपीय
गीतिं तदाकर्णनलोलुपोऽयम् ।
हातुं नु जातु स्पृहयत्यवैमि
विधुं मृगस्त्वद्वदनभ्रमेण ॥
गीतिं तदाकर्णनलोलुपोऽयम् ।
हातुं नु जातु स्पृहयत्यवैमि
विधुं मृगस्त्वद्वदनभ्रमेण ॥
अन्वयः
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अयम् मृगः त्वत्-वदन-भ्रमेण तव आनने जात-चरीम् गीतिम् निपीय, तत्-आकर्णन-लोलुपः सन् विधुम् जातु हातुम् नु स्पृहयति इति अवैमि ।
Summary
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I believe this deer (in the moon), mistaking the moon for your face, has drunk the song originating from your face and, eager to keep hearing it, never desires to leave the moon.
पदच्छेदः
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| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| आनने | आनन (७.१) | in the face |
| जातचरीम् | जात–चरी (२.१) | originating |
| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having drunk |
| गीतिम् | गीति (२.१) | the song (speech) |
| तदाकर्णनलोलुपः | तद्–आकर्णन–लोलुप (१.१) | eager to hear it |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| हातुम् | हातुम् (√हा+तुमुन्) | to leave |
| नु | नु | surely |
| जातु | जातु | ever |
| स्पृहयति | स्पृहयति (√स्पृह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | desires |
| अवैमि | अवैमि (अव√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I believe |
| विधुम् | विधु (२.१) | the moon |
| मृगः | मृग (१.१) | the deer |
| त्वद्वदनभ्रमेण | युष्मद्–वदन–भ्रम (३.१) | due to the mistake for your face |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | वा | न | ने | जा | त | च | रीं | नि | पी | य |
| गी | तिं | त | दा | क | र्ण | न | लो | लु | पो | ऽयम् |
| हा | तुं | नु | जा | तु | स्पृ | ह | य | त्य | वै | मि |
| वि | धुं | मृ | ग | स्त्व | द्व | द | न | भ्र | मे | ण |
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