पाञ्चजन्यमधिगत्य करेणा-
पाञ्चजन्यमसुरानिति वक्षि
चेतनाः स्थ किल पश्यत किं
नाचेतनोऽपि मयि मुक्तविरोध्-
अः
पाञ्चजन्यमधिगत्य करेणा-
पाञ्चजन्यमसुरानिति वक्षि
चेतनाः स्थ किल पश्यत किं
नाचेतनोऽपि मयि मुक्तविरोध्-
अः
पाञ्चजन्यमसुरानिति वक्षि
चेतनाः स्थ किल पश्यत किं
नाचेतनोऽपि मयि मुक्तविरोध्-
अः
अन्वयः
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करेण पाञ्चजन्यम् अधिगत्य, (त्वम्) असुरान् अपाञ्चजन्यम् इति वक्षि - "चेतनाः स्थ किल? पश्यत, मयि अचेतनः अपि मुक्त-विरोधः (अस्ति), (यूयं) किम् न (मुक्तविरोधाः स्थ)?"
Summary
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Holding the Panchajanya conch in your hand, you speak to the Asuras, saying: "Are you truly conscious beings? Look, even this non-sentient conch has given up its hostility towards me. Why haven't you?"
पदच्छेदः
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| पाञ्चजन्यम् | पाञ्चजन्य (२.१) | the Panchajanya conch |
| अधिगत्य | अधिगत्य (अधि√गम्+ल्यप्) | having held |
| करेण | कर (३.१) | with the hand |
| अपाञ्चजन्यम् | अपाञ्चजन्य (२.१) | not of the common folk |
| असुरान् | असुर (२.३) | the Asuras |
| इति | इति | thus |
| वक्षि | वक्षि (√वच् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you speak |
| चेतनाः | चेतन (१.३) | conscious beings |
| स्थ | स्थ (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | you are |
| किल | किल | indeed |
| पश्यत | पश्यत (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | see |
| किं | किम् | why |
| न | न | not |
| अचेतनः | अचेतन (१.१) | the non-sentient one |
| अपि | अपि | even |
| मयि | अस्मद् (७.१) | towards me |
| मुक्तविरोधः | मुक्त (√मुच्+क्त)–विरोध (१.१) | has given up hostility |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पा | ञ्च | ज | न्य | म | धि | ग | त्य | क | रे | णा |
| पा | ञ्च | ज | न्य | म | सु | रा | नि | ति | व | क्षि |
| चे | त | नाः | स्थ | कि | ल | प | श्य | त | किं | ना |
| चे | त | नो | ऽपि | म | यि | मु | क्त | वि | रो | धः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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