अर्धचक्रवपुषार्जुनबाहू-
न्योऽलुनात्परशुनाथ सहस्रम् ।
तेन किं सकलचक्रविलूने
बाणबाहुनिचयेऽञ्चति चिक्रम् ॥
अर्धचक्रवपुषार्जुनबाहू-
न्योऽलुनात्परशुनाथ सहस्रम् ।
तेन किं सकलचक्रविलूने
बाणबाहुनिचयेऽञ्चति चिक्रम् ॥
न्योऽलुनात्परशुनाथ सहस्रम् ।
तेन किं सकलचक्रविलूने
बाणबाहुनिचयेऽञ्चति चिक्रम् ॥
अन्वयः
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यः परशुनाथः अर्धचक्र-वपुषा (परशुना) अर्जुन-बाहून् सहस्रम् अलुनात्, तेन सकल-चक्र-विलूने बाण-बाहु-निचये (सति) किम् चिक्रम् अञ्चति?
Summary
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Parashurama, who with his axe—a body like half a discus—cut off the thousand arms of Kartavirya Arjuna, does he feel any pride now that the multitude of Bana's arms has been severed by the complete discus (of Krishna)?
पदच्छेदः
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| अर्धचक्रवपुषा | अर्ध–चक्र–वपुस् (३.१) | with a body like a half-discus (axe) |
| अर्जुनबाहून् | अर्जुन–बाहु (२.३) | the arms of (Kartavirya) Arjuna |
| यः | यद् (१.१) | who |
| अलुनात् | अलुनात् (√लू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | cut off |
| परशुनाथ | परशु–नाथ (१.१) | the lord of the axe (Parashurama) |
| सहस्रम् | सहस्र (२.१) | a thousand |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| किं | किम् | what? |
| सकलचक्रविलूने | सकल–चक्र–विलून (वि√लू+क्त, ७.१) | when cut by the whole discus |
| बाणबाहुनिचये | बाण–बाहु–निचय (७.१) | in the case of the multitude of Bana's arms |
| अञ्चति | अञ्चति (√अञ्च् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does he feel |
| चिक्रम् | चिक्रम (२.१) | pride |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | र्ध | च | क्र | व | पु | षा | र्जु | न | बा | हू |
| न्यो | ऽलु | ना | त्प | र | शु | ना | थ | स | ह | स्रम् |
| ते | न | किं | स | क | ल | च | क्र | वि | लू | ने |
| बा | ण | बा | हु | नि | च | ये | ऽञ्च | ति | चि | क्रम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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