प्राणवत्प्रणयिराध न राधा
पुत्रशत्रुसखिता सदृशी ते ।
श्रीप्रियस्य सदृगेव तवश्री-
वत्समात्महृदि धर्तुमजस्रम् ॥
प्राणवत्प्रणयिराध न राधा
पुत्रशत्रुसखिता सदृशी ते ।
श्रीप्रियस्य सदृगेव तवश्री-
वत्समात्महृदि धर्तुमजस्रम् ॥
पुत्रशत्रुसखिता सदृशी ते ।
श्रीप्रियस्य सदृगेव तवश्री-
वत्समात्महृदि धर्तुमजस्रम् ॥
अन्वयः
AI
ते प्राणवत् प्रणयिराध राधा न (सदृशी) । पुत्रशत्रुसखिता (अपि) न सदृशी । श्रीप्रियस्य तव आत्महृदि अजस्रम् श्रीवत्सम् धर्तुम् एव सदृक् ।
Summary
AI
For you, neither Radha, who loved you like her own life, nor your friendship with Karna, your son's enemy, is truly fitting. For you, the beloved of Lakshmi, it is only fitting to always bear the Srivatsa mark upon your own heart.
पदच्छेदः
AI
| प्राणवत् | प्राणवत् | like her own life |
| प्रणयिराध | प्रणयिन्–राधस् (१.१) | Radha, whose wealth is love |
| न | न | not |
| राधा | राधा (१.१) | Radha |
| पुत्रशत्रुसखिता | पुत्र–शत्रु–सखिता (१.१) | friendship with your son's enemy (Karna) |
| सदृशी | सदृश् (१.१) | fitting |
| ते | युष्मद् (६.१) | for you |
| श्रीप्रियस्य | श्री–प्रिय (६.१) | for the beloved of Shri (Lakshmi) |
| सदृक् | सदृश् (१.१) | fitting |
| एव | एव | only |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| श्रीवत्सम् | श्रीवत्स (२.१) | the Srivatsa mark |
| आत्महृदि | आत्मन्–हृद् (७.१) | on your own heart |
| धर्तुम् | धर्तुम् (√धृ+तुमुन्) | to bear |
| अजस्रम् | अजस्रम् | always |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | ण | व | त्प्र | ण | यि | रा | ध | न | रा | धा |
| पु | त्र | श | त्रु | स | खि | ता | स | दृ | शी | ते |
| श्री | प्रि | य | स्य | स | दृ | गे | व | त | व | श्री |
| व | त्स | मा | त्म | हृ | दि | ध | र्तु | म | ज | स्रम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.