भूभृतं पृथुतपोघनमाप्त-
स्तं शुचिः स्नपयति स्म पुरोधाः ।
संदधज्जलधरस्खलदोघ-
स्तीर्थवारिलहरीरुपरिष्टात् ॥
भूभृतं पृथुतपोघनमाप्त-
स्तं शुचिः स्नपयति स्म पुरोधाः ।
संदधज्जलधरस्खलदोघ-
स्तीर्थवारिलहरीरुपरिष्टात् ॥
स्तं शुचिः स्नपयति स्म पुरोधाः ।
संदधज्जलधरस्खलदोघ-
स्तीर्थवारिलहरीरुपरिष्टात् ॥
अन्वयः
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आप्तः शुचिः पुरोधाः उपरिष्टात् जलधरस्खलत्-ओघः (इव) तीर्थवारिलहरीः संदधत् पृथुतपोघनम् तम् भूभृतम् स्नपयति स्म ।
Summary
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The trustworthy and pure priest bathed him, the king, who was a mass of great penance, by pouring waves of holy water from above, resembling a stream falling from a cloud.
पदच्छेदः
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| भूभृतम् | भूभृत् (२.१) | the king |
| पृथुतपोघनम् | पृथुतपोघन (२.१) | who was a mass of great penance |
| आप्तः | आप्त (√आप्+क्त, १.१) | trustworthy |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| शुचिः | शुचि (१.१) | pure |
| स्नपयति स्म | स्नपयति स्म (√स्ना +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bathed |
| पुरोधाः | पुरोधस् (१.१) | the priest |
| संदधत् | संदधत् (सम्√धा+शतृ, १.१) | pouring |
| जलधरस्खलत्-ओघः | जलधर–स्खलत् (√स्खल्+शतृ)–ओघ (१.१) | a stream falling from a cloud |
| तीर्थवारिलहरीः | तीर्थ–वारि–लहरी (२.३) | waves of holy water |
| उपरिष्टात् | उपरिष्टात् | from above |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | भृ | तं | पृ | थु | त | पो | घ | न | मा | प्त |
| स्तं | शु | चिः | स्न | प | य | ति | स्म | पु | रो | धाः |
| सं | द | ध | ज्ज | ल | ध | र | स्ख | ल | दो | घ |
| स्ती | र्थ | वा | रि | ल | ह | री | रु | प | रि | ष्टात् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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