पांसुला बहुपतिर्नियतं या
वेधसारचि रुषा नवखण्डा ।
तां भुवं कृतवतो द्विजभुक्तां
युक्तकारितरता तव जीयात् ॥
पांसुला बहुपतिर्नियतं या
वेधसारचि रुषा नवखण्डा ।
तां भुवं कृतवतो द्विजभुक्तां
युक्तकारितरता तव जीयात् ॥
वेधसारचि रुषा नवखण्डा ।
तां भुवं कृतवतो द्विजभुक्तां
युक्तकारितरता तव जीयात् ॥
अन्वयः
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या पांसुला बहुपतिः (भूमिः) नियतम् वेधसा रुषा नवखण्डा अरचि, ताम् भुवम् द्विजभुक्ताम् कृतवतः तव युक्तकारितरता जीयात् ।
Summary
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"The earth, which is unchaste and has many masters (kings), was certainly created in nine continents by the Creator in anger. May Your supreme propriety in making that earth enjoyed by the Brahmanas be victorious."
पदच्छेदः
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| पांसुला | पांसुला (१.१) | unchaste |
| बहुपतिः | बहु–पति (१.१) | having many masters |
| नियतम् | नियतम् | certainly |
| या | यद् (१.१) | which (earth) |
| वेधसा | वेधस् (३.१) | by the Creator |
| अरचि | अरचि (√रच् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was created |
| रुषा | रुष् (३.१) | in anger |
| नवखण्डा | नव–खण्डा (१.१) | with nine continents |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| भुवम् | भू (२.१) | earth |
| कृतवतः | कृतवत् (√कृ+क्तवतु, ६.१) | of You who made |
| द्विजभुक्ताम् | द्विज–भुक्ता (√भुज्+क्त, २.१) | enjoyed by the Brahmanas |
| युक्तकारितरता | युक्तकारितरता (१.१) | the supreme propriety |
| तव | युष्मद् (६.१) | Your |
| जीयात् | जीयात् (√जि कर्तरि आशिर्लिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it be victorious |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पां | सु | ला | ब | हु | प | ति | र्नि | य | तं | या |
| वे | ध | सा | र | चि | रु | षा | न | व | ख | ण्डा |
| तां | भु | वं | कृ | त | व | तो | द्वि | ज | भु | क्तां |
| यु | क्त | का | रि | त | र | ता | त | व | जी | यात् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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