क्षत्त्रजातिरुदियाय भुजाभ्यां
या तवैव भुवनं सृजतः प्राक् ।
जामदग्न्यवपुषस्तव तस्या-
स्तौ लयार्थमुचितौ विजयेताम् ॥
क्षत्त्रजातिरुदियाय भुजाभ्यां
या तवैव भुवनं सृजतः प्राक् ।
जामदग्न्यवपुषस्तव तस्या-
स्तौ लयार्थमुचितौ विजयेताम् ॥
या तवैव भुवनं सृजतः प्राक् ।
जामदग्न्यवपुषस्तव तस्या-
स्तौ लयार्थमुचितौ विजयेताम् ॥
अन्वयः
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प्राक् भुवनम् सृजतः तव एव भुजाभ्याम् या क्षत्त्रजातिः उदियाय, जामदग्न्यवपुषः तव तौ (भुजौ) तस्याः लय अर्थम् उचितौ (सन्तौ) विजयेताम् ।
Summary
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"The Kshatriya caste that arose from Your very arms when You created the world long ago—may those same two arms of Yours, in the form of Parashurama, be victorious, as they are fit for that caste's destruction."
पदच्छेदः
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| क्षत्त्रजातिः | क्षत्त्र–जाति (१.१) | the Kshatriya caste |
| उदियाय | उदियाय (उद्√इ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arose |
| भुजाभ्याम् | भुज (३.२) | from the two arms |
| या | यद् (१.१) | which |
| तव | युष्मद् (६.१) | Your |
| एव | एव | very |
| भुवनम् | भुवन (२.१) | the world |
| सृजतः | सृजत् (√सृज्+शतृ, ६.१) | of (You) creating |
| प्राक् | प्राच् | before |
| जामदग्न्यवपुषः | जामदग्न्य–वपुस् (६.१) | of (You) with the body of Parashurama |
| तव | युष्मद् (६.१) | Your |
| तस्याः | तद् (६.१) | its |
| तौ | तद् (१.२) | those two (arms) |
| लयार्थम् | लय–अर्थम् | for the purpose of destruction |
| उचितौ | उचित (१.२) | being fit |
| विजयेताम् | विजयेताम् (वि√जि कर्तरि आशिर्लिङ् (आत्मने.) प्र.पु. द्वि.) | may they be victorious |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | त्त्र | जा | ति | रु | दि | या | य | भु | जा | भ्यां |
| या | त | वै | व | भु | व | नं | सृ | ज | तः | प्राक् |
| जा | म | द | ग्न्य | व | पु | ष | स्त | व | त | स्या |
| स्तौ | ल | या | र्थ | मु | चि | तौ | वि | ज | ये | ताम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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