दैत्यभर्तुरुदरान्धुनिविष्टां
शक्रसंपदमिवोद्धरतस्ते ।
पातु पाणिशृणिपञ्चकमस्मा-
ञ्छिन्नरज्जुनिभलग्नतदन्त्रम् ॥
दैत्यभर्तुरुदरान्धुनिविष्टां
शक्रसंपदमिवोद्धरतस्ते ।
पातु पाणिशृणिपञ्चकमस्मा-
ञ्छिन्नरज्जुनिभलग्नतदन्त्रम् ॥
शक्रसंपदमिवोद्धरतस्ते ।
पातु पाणिशृणिपञ्चकमस्मा-
ञ्छिन्नरज्जुनिभलग्नतदन्त्रम् ॥
अन्वयः
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दैत्यभर्तुः उदरात् धुनि विष्टाम् शक्रसंपदम् इव उद्धरतः ते, छिन्नरज्जुनिभलग्नतदन्त्रम् पाणिशृणिपञ्चकम् अस्मान् पातु ।
Summary
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"May the five sharp nails on Your hands protect us. As You rescued the fortune of Indra, which had entered the river of the demon king's belly, his entrails clung to them like severed ropes."
पदच्छेदः
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| दैत्यभर्तुः | दैत्य–भर्तृ (६.१) | of the demon king |
| उदरात् | उदर (५.१) | from the belly |
| धुनि | धुनि (७.१) | in the river |
| विष्टाम् | विष्टा (√विश्+क्त, २.१) | entered |
| शक्रसंपदम् | शक्र–संपद् (२.१) | the fortune of Indra |
| इव | इव | as if |
| उद्धरतः | उद्धरत् (उद्√हृ+शतृ, ६.१) | of You rescuing |
| ते | युष्मद् (६.१) | Your |
| पातु | पातु (√पा कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it protect |
| पाणिशृणिपञ्चकम् | पाणि–शृणि–पञ्चक (१.१) | the set of five sharp nails on the hand |
| अस्मान् | अस्मद् (२.३) | us |
| छिन्नरज्जुनिभलग्नतदन्त्रम् | छिन्न (√छिद्+क्त)–रज्जु–निभ–लग्न (√लग्+क्त)–तद्–अन्त्र (१.१) | to which his entrails were attached like severed ropes |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दै | त्य | भ | र्तु | रु | द | रा | न्धु | नि | वि | ष्टां |
| श | क्र | सं | प | द | मि | वो | द्ध | र | त | स्ते |
| पा | तु | पा | णि | शृ | णि | प | ञ्च | क | म | स्मा |
| ञ्छि | न्न | र | ज्जु | नि | भ | ल | ग्न | त | द | न्त्रम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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