मैव वाङ्मनसयोर्विषयो
भूस्त्वां पुनर्न कथमुद्दिशतां
ते उत्कचातकयुगस्य घनः
स्यात्तृप्तये घनमनाप्नुवतो-
ऽपि
मैव वाङ्मनसयोर्विषयो
भूस्त्वां पुनर्न कथमुद्दिशतां
ते उत्कचातकयुगस्य घनः
स्यात्तृप्तये घनमनाप्नुवतो-
ऽपि
भूस्त्वां पुनर्न कथमुद्दिशतां
ते उत्कचातकयुगस्य घनः
स्यात्तृप्तये घनमनाप्नुवतो-
ऽपि
अन्वयः
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(त्वम्) वाक् मनसयोः विषयः मा एव भूः । पुनः ते (भक्ताः) त्वाम् कथम् न उद्दिशताम्? घनम् अनाप्नुवतः अपि उत्कचातकयुगस्य घनः तृप्तये स्यात् ।
Summary
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"May You not be an object of speech and mind. Yet, how can Your devotees not aim for You? For the thirsty Chataka bird, the mere sight of a cloud, even without obtaining its water, brings satisfaction."
पदच्छेदः
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| मा | मा | may not |
| एव | एव | indeed |
| वाङ्मनसयोः | वाच्–मनस् (६.२) | of speech and mind |
| विषयः | विषय (१.१) | an object |
| भूः | भूः (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you be |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | You |
| पुनः | पुनर् | yet |
| न | न | not |
| कथम् | कथम् | how |
| उद्दिशताम् | उद्दिशताम् (उद्√दिश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | aim for |
| ते | तद् (१.३) | Your devotees |
| उत्कचातकयुगस्य | उत्क–चातक–युग (६.१) | of the thirsty Chataka bird |
| घनः | घन (१.१) | a cloud |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| तृप्तये | तृप्ति (४.१) | for satisfaction |
| घनम् | घन (२.१) | the cloud (water) |
| अनाप्नुवतः | अनाप्नुवत् (न√आप्+शतृ, ६.१) | of one not obtaining |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मै | व | वा | ङ्म | न | स | यो | र्वि | ष | यो | भू |
| स्त्वां | पु | न | र्न | क | थ | मु | द्दि | श | तां | ते |
| उ | त्क | चा | त | क | यु | ग | स्य | घ | नः | स्या |
| त्तृ | प्त | ये | घ | न | म | ना | प्नु | व | तो | ऽपि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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