द्रागुपाह्रियत तस्य नृपैत-
द्दृष्टिदानबहुमानकृतार्थैः ।
स्वस्य दिश्यमथ रत्नमपूर्वं
यत्नकल्पितगुणाधिकचित्रम् ॥
द्रागुपाह्रियत तस्य नृपैत-
द्दृष्टिदानबहुमानकृतार्थैः ।
स्वस्य दिश्यमथ रत्नमपूर्वं
यत्नकल्पितगुणाधिकचित्रम् ॥
द्दृष्टिदानबहुमानकृतार्थैः ।
स्वस्य दिश्यमथ रत्नमपूर्वं
यत्नकल्पितगुणाधिकचित्रम् ॥
अन्वयः
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अथ तत्-दृष्टिदान-बहुमान-कृतार्थैः नृपैः यत्न-कल्पित-गुण-अधिक-चित्रम् अपूर्वम् स्वस्य दिश्यम् रत्नम् तस्य द्राक् उपाह्रियत ।
Summary
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Then, by the kings who felt their purpose fulfilled by the great honor of his glance, an unprecedented jewel from their own region, whose superior qualities and wonder were fashioned with great effort, was quickly offered to him.
पदच्छेदः
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| द्राक् | द्राक् | quickly |
| उपाह्रियत | उपाह्रियत (उप+आ√हृ भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was offered |
| तस्य | तद् (४.१) | to him |
| नृपैः | नृप (३.३) | by the kings |
| तत्-दृष्टिदान-बहुमान-कृतार्थैः | तत्–दृष्टिदान–बहुमान–कृतार्थ (३.३) | by those who felt their purpose fulfilled by the great honor of his glance |
| स्वस्य | स्व (६.१) | their own |
| दिश्यम् | दिश्य (२.१) | belonging to their region |
| अथ | अथ | then |
| रत्नम् | रत्न (२.१) | a jewel |
| अपूर्वम् | अपूर्व (२.१) | unprecedented |
| यत्न-कल्पित-गुण-अधिक-चित्रम् | यत्न–कल्पित (√कॢप्+णिच्+क्त)–गुण–अधिक–चित्र (२.१) | whose superior qualities and wonder were fashioned with effort |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्रा | गु | पा | ह्रि | य | त | त | स्य | नृ | पै | त |
| द्दृ | ष्टि | दा | न | ब | हु | मा | न | कृ | ता | र्थैः |
| स्व | स्य | दि | श्य | म | थ | र | त्न | म | पू | र्वं |
| य | त्न | क | ल्पि | त | गु | णा | धि | क | चि | त्रम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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