साङ्कुरेव रुचिपीततमा
यैर्यैः पुरास्ति रजनी रजनीव ।
ते धृता वितरितुं त्रिदशेभ्यो
यत्र हेमतिलका इव दीपाः ॥
साङ्कुरेव रुचिपीततमा
यैर्यैः पुरास्ति रजनी रजनीव ।
ते धृता वितरितुं त्रिदशेभ्यो
यत्र हेमतिलका इव दीपाः ॥
यैर्यैः पुरास्ति रजनी रजनीव ।
ते धृता वितरितुं त्रिदशेभ्यो
यत्र हेमतिलका इव दीपाः ॥
अन्वयः
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यत्र यैः यैः (दीपैः) रुचि-पीत-तमा रजनी पुरा रजनी इव न अस्ति, (सा इदानीं) साङ्कुरा इव अस्ति, ते दीपाः त्रिदशेभ्यः हेम-तिलकाः इव वितरितुम् धृताः।
Summary
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There, lamps were placed that looked like golden forehead marks being offered to the gods. By their lustre, the darkness was so completely consumed that the night was no longer its former self, but seemed to be sprouting anew with light.
पदच्छेदः
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| साङ्कुरा | साङ्कुर (१.१) | sprouting |
| इव | इव | as if |
| रुचि | रुचि | by the lustre |
| पीत | पीत (√पा+क्त) | drunk |
| तमा | तमस् (१.१) | whose darkness |
| यैः | यद् (३.३) | by which |
| यैः | यद् (३.३) | by which |
| पुरा | पुरा | before |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is (not) |
| रजनी | रजनी (१.१) | the night |
| रजनी | रजनी | night |
| इव | इव | like |
| ते | तद् (१.३) | they (the lamps) |
| धृताः | धृत (√धृ+क्त, १.३) | were held |
| वितरितुम् | वितरितुम् (वि√तृ+तुमुन्) | to distribute |
| त्रिदशेभ्यः | त्रिदश (४.३) | to the gods |
| यत्र | यत्र | where |
| हेमतिलकाः | हेमतिलक (१.३) | golden forehead marks |
| इव | इव | like |
| दीपाः | दीप (१.३) | lamps |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | ङ्कु | रे | व | रु | चि | पी | त | त | मा | यै |
| र्यैः | पु | रा | स्ति | र | ज | नी | र | ज | नी | व |
| ते | धृ | ता | वि | त | रि | तुं | त्रि | द | शे | भ्यो |
| य | त्र | हे | म | ति | ल | का | इ | व | दी | पाः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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