श्वैत्यशैत्यजलदैवतमन्त्र-
स्वादुताप्रमुदितां चतुरक्षीम् ।
वीक्ष्य मोघधृतसौरभलोभं
घ्राणमस्य सलिलघ्रमिवासीत् ॥
श्वैत्यशैत्यजलदैवतमन्त्र-
स्वादुताप्रमुदितां चतुरक्षीम् ।
वीक्ष्य मोघधृतसौरभलोभं
घ्राणमस्य सलिलघ्रमिवासीत् ॥
स्वादुताप्रमुदितां चतुरक्षीम् ।
वीक्ष्य मोघधृतसौरभलोभं
घ्राणमस्य सलिलघ्रमिवासीत् ॥
अन्वयः
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श्वैत्य-शैत्य-जल-दैवत-मन्त्र-स्वादुता-प्रमुदिताम् चतुरक्षीम् वीक्ष्य, अस्य घ्राणम् मोघ-धृत-सौरभ-लोभम् (सत्) सलिलघ्रम् इव आसीत्।
Summary
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Upon seeing Damayanti, who was delighted by the sweetness of the mantras for the water deities of whiteness and coolness, Nala's sense of smell became as if it could only perceive water. Its desire for any other fragrance was rendered futile by her presence.
पदच्छेदः
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| श्वैत्य | श्वैत्य | whiteness |
| शैत्य | शैत्य | coolness |
| जल | जल | water |
| दैवत | दैवत | deity |
| मन्त्र | मन्त्र | mantra |
| स्वादुता | स्वादुता | by the sweetness |
| प्रमुदिताम् | प्रमुदित (प्र√मुद्+क्त, २.१) | delighted |
| चतुरक्षीम् | चतुरक्षि (२.१) | the 'four-eyed one' (Damayanti) |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| मोघ | मोघ | in vain |
| धृत | धृत (√धृ+क्त) | held |
| सौरभ | सौरभ | for fragrance |
| लोभम् | लोभ (१.१) | whose desire |
| घ्राणम् | घ्राण (१.१) | the sense of smell |
| अस्य | इदम् (६.१) | of him |
| सलिलघ्रम् | सलिलघ्र (१.१) | smelling only water |
| इव | इव | as if |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्वै | त्य | शै | त्य | ज | ल | दै | व | त | म | न्त्र |
| स्वा | दु | ता | प्र | मु | दि | तां | च | तु | र | क्षीम् |
| वी | क्ष्य | मो | घ | धृ | त | सौ | र | भ | लो | भं |
| घ्रा | ण | म | स्य | स | लि | ल | घ्र | मि | वा | सीत् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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