त्वद्वाचः स्तुतये वयं न पटवः पीयूषमेव स्तुम-
स्तस्यार्थे गरुडामरेन्द्रसमरः स्थाने स जानेऽजनि ।
द्राक्षापानकमानमर्दनसृजा क्षीरे दृढावज्ञया
यस्मिन्नाम धृतोऽनया निजपदप्रक्षालनानुग्रहः ॥
त्वद्वाचः स्तुतये वयं न पटवः पीयूषमेव स्तुम-
स्तस्यार्थे गरुडामरेन्द्रसमरः स्थाने स जानेऽजनि ।
द्राक्षापानकमानमर्दनसृजा क्षीरे दृढावज्ञया
यस्मिन्नाम धृतोऽनया निजपदप्रक्षालनानुग्रहः ॥
स्तस्यार्थे गरुडामरेन्द्रसमरः स्थाने स जानेऽजनि ।
द्राक्षापानकमानमर्दनसृजा क्षीरे दृढावज्ञया
यस्मिन्नाम धृतोऽनया निजपदप्रक्षालनानुग्रहः ॥
अन्वयः
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वयम् त्वद्वाचः स्तुतये न पटवः (स्मः), पीयूषम् एव स्तुमः । जाने, तस्य अर्थे सः गरुडामरेन्द्रसमरः स्थाने अजनि । यस्मिन् (पीयूषे) नाम अनया (त्वद्वाचा) द्राक्षापानकमानमर्दनसृजा क्षीरे दृढावज्ञया निजपदप्रक्षालनानुग्रहः धृतः ।
Summary
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We are not skilled enough to praise your speech; we praise nectar instead. I think the famous battle between Garuda and Indra for its sake was appropriate. For, your speech, which crushes the pride of grape-juice and creates firm disdain for milk, has conferred upon that nectar the favor of washing its own feet.
पदच्छेदः
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| त्वद्वाचः | युष्मद्–वाच् (६.१) | of your speech |
| स्तुतये | स्तुति (४.१) | for the praise |
| वयम् | अस्मद् (१.३) | we |
| न | न | not |
| पटवः | पटु (१.३) | are skilled |
| पीयूषम् | पीयूष (२.१) | nectar |
| एव | एव | only |
| स्तुमः | स्तुमः (√स्तु कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we praise |
| तस्य | तद् (६.१) | its |
| अर्थे | अर्थ (७.१) | for the sake of |
| गरुडामरेन्द्रसमरः | गरुड–अमरेन्द्र–समर (१.१) | the battle between Garuda and Indra |
| स्थाने | स्थान (७.१) | was appropriate |
| सः | तद् (१.१) | that |
| जाने | जाने (√ज्ञा कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I think |
| अजनि | अजनि (√जन् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was born/happened |
| द्राक्षापानकमानमर्दनसृजा | द्राक्षा–पानक–मान–मर्दन–सृज् (३.१) | by that which creates the crushing of the pride of grape-juice |
| क्षीरे | क्षीर (७.१) | for milk |
| दृढावज्ञया | दृढ–अवज्ञा (३.१) | with firm disdain |
| यस्मिन् | यद् (७.१) | on which (nectar) |
| नाम | नाम | indeed |
| धृतः | धृत (√धृ+क्त, १.१) | was placed |
| अनया | इदम् (३.१) | by this (speech) |
| निजपदप्रक्षालनानुग्रहः | निज–पद–प्रक्षालन–अनुग्रह (१.१) | the favor of washing its own feet |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | द्वा | चः | स्तु | त | ये | व | यं | न | प | ट | वः | पी | यू | ष | मे | व | स्तु | म |
| स्त | स्या | र्थे | ग | रु | डा | म | रे | न्द्र | स | म | रः | स्था | ने | स | जा | ने | ऽज | नि |
| द्रा | क्षा | पा | न | क | मा | न | म | र्द | न | सृ | जा | क्षी | रे | दृ | ढा | व | ज्ञ | या |
| य | स्मि | न्ना | म | धृ | तो | ऽन | या | नि | ज | प | द | प्र | क्षा | ल | ना | नु | ग्र | हः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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