स ग्राम्यः स विदग्धसंसदि सदा गच्छत्यपाङ्क्तेयतां
तं च स्प्रष्टुमपि स्मरस्य विशिखा मुग्धे विगानोन्मुखाः ।
यः किं मध्विति नाधरं तव कथं हेमेति न त्वद्वपुः
कीदृङ्नाम सुधेति पृच्छति न ते दत्ते गिरं चोत्तरम् ॥
स ग्राम्यः स विदग्धसंसदि सदा गच्छत्यपाङ्क्तेयतां
तं च स्प्रष्टुमपि स्मरस्य विशिखा मुग्धे विगानोन्मुखाः ।
यः किं मध्विति नाधरं तव कथं हेमेति न त्वद्वपुः
कीदृङ्नाम सुधेति पृच्छति न ते दत्ते गिरं चोत्तरम् ॥
तं च स्प्रष्टुमपि स्मरस्य विशिखा मुग्धे विगानोन्मुखाः ।
यः किं मध्विति नाधरं तव कथं हेमेति न त्वद्वपुः
कीदृङ्नाम सुधेति पृच्छति न ते दत्ते गिरं चोत्तरम् ॥
अन्वयः
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मुग्धे, यः तव अधरम् 'किम् मधु' इति न पृच्छति, त्वद्वपुः 'कथम् हेम' इति न (पृच्छति), 'कीदृक् नाम सुधा' इति न (पृच्छति), ते गिरम् उत्तरम् च न दत्ते, सः ग्राम्यः (अस्ति) । सः विदग्धसंसदि सदा अपाङ्क्तेयताम् गच्छति । तम् स्प्रष्टुम् अपि स्मरस्य विशिखाः विगानोन्मुखाः (भवन्ति) ।
Summary
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O charming one, he who does not ask about your lip, 'Is this honey?', your body, 'Is this gold?', or your speech, 'What is this nectar?', and does not offer a reply, is a boor. He is always considered an outcast in the assembly of the learned. Even Kama's arrows are disinclined to touch him.
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | He |
| ग्राम्यः | ग्राम्य (१.१) | is a boor |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विदग्धसंसदि | विदग्ध–संसद् (७.१) | in the assembly of the learned |
| सदा | सदा | always |
| गच्छति | गच्छति (√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| अपाङ्क्तेयताम् | अपाङ्क्तेयता (२.१) | the state of being an outcast |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| च | च | and |
| स्प्रष्टुम् | स्प्रष्टुम् (√स्पृश्+तुमुन्) | to touch |
| अपि | अपि | even |
| स्मरस्य | स्मर (६.१) | of Kama |
| विशिखाः | विशिख (१.३) | the arrows |
| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O charming one |
| विगानोन्मुखाः | विगान–उन्मुख (१.३) | are disinclined |
| यः | यद् (१.१) | who |
| किम् | किम् | is this |
| मधु | मधु (१.१) | honey |
| इति | इति | thus |
| न | न | not |
| अधरम् | अधर (२.१) | about the lip |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| कथम् | कथम् | is this |
| हेम | हेमन् (१.१) | gold |
| इति | इति | thus |
| न | न | not |
| त्वद्वपुः | युष्मद्–वपुस् (२.१) | about your body |
| कीदृक् | कीदृश् (१.१) | what kind of |
| नाम | नाम | indeed |
| सुधा | सुधा (१.१) | nectar |
| इति | इति | thus |
| पृच्छति | पृच्छति (√प्रछ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | asks |
| न | न | not |
| ते | युष्मद् (४.१) | to you |
| दत्ते | दत्ते (√दा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gives |
| गिरम् | गिर् (२.१) | a word (of praise) |
| च | च | and |
| उत्तरम् | उत्तर (२.१) | an answer |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ग्रा | म्यः | स | वि | द | ग्ध | सं | स | दि | स | दा | ग | च्छ | त्य | पा | ङ्क्ते | य | तां |
| तं | च | स्प्र | ष्टु | म | पि | स्म | र | स्य | वि | शि | खा | मु | ग्धे | वि | गा | नो | न्मु | खाः |
| यः | किं | म | ध्वि | ति | ना | ध | रं | त | व | क | थं | हे | मे | ति | न | त्व | द्व | पुः |
| की | दृ | ङ्ना | म | सु | धे | ति | पृ | च्छ | ति | न | ते | द | त्ते | गि | रं | चो | त्त | रम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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