उन्मीलद्गुडपाकतन्तुलतया रज्ज्वा भ्रमीरर्जय-
न्दानान्तःश्रुतशर्कराचलमथः स्वेनामृतान्धाः स्मरः ।
नव्यामिक्षुरसोदधेर्यदि सुधामुत्थापयेत्सा भव-
ज्जिह्वायाः कृतिमाह्वयेत परमां मत्कर्णयोः पारणाम् ॥
उन्मीलद्गुडपाकतन्तुलतया रज्ज्वा भ्रमीरर्जय-
न्दानान्तःश्रुतशर्कराचलमथः स्वेनामृतान्धाः स्मरः ।
नव्यामिक्षुरसोदधेर्यदि सुधामुत्थापयेत्सा भव-
ज्जिह्वायाः कृतिमाह्वयेत परमां मत्कर्णयोः पारणाम् ॥
न्दानान्तःश्रुतशर्कराचलमथः स्वेनामृतान्धाः स्मरः ।
नव्यामिक्षुरसोदधेर्यदि सुधामुत्थापयेत्सा भव-
ज्जिह्वायाः कृतिमाह्वयेत परमां मत्कर्णयोः पारणाम् ॥
अन्वयः
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स्मरः उन्मीलद्गुडपाकतन्तुलतया रज्ज्वा भ्रमीः अर्जयन्, स्वेन दानान्तःश्रुतशर्कराचलम् अधः (कृत्वा), यदि नव्याम् इक्षुरसोदधेः अमृतान्धाः सुधाम् उत्थापयेत्, सा भवज्जिह्वायाः कृतिम्, मत्कर्णयोः परमाम् पारणाम् आह्वयेत ।
Summary
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If Kama, using a rope made from the thread of thickening molasses, were to churn the new ocean of sugarcane juice with the famed sugar-mountain as the churning rod, and raise nectar from it, that nectar would challenge the creation of your tongue and be the ultimate feast for my ears.
पदच्छेदः
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| उन्मीलद्गुडपाकतन्तुलतया | उन्मीलत्–गुडपाक–तन्तु–लता (३.१) | by the vine-like thread of thickening molasses |
| रज्ज्वा | रज्जु (३.१) | with the rope |
| भ्रमीः | भ्रमि (२.३) | rotations |
| अर्जयन् | अर्जयन् (√ऋज्+णिच्+शतृ, १.१) | causing |
| दानान्तःश्रुतशर्कराचलम् | दान–अन्तः–श्रुत–शर्करा–अचल (२.१) | the famed sugar-mountain among elephants |
| अधः | अधः | below |
| स्वेन | स्व (३.१) | by his own |
| अमृतान्धाः | अमृत–अन्धस् (१.१) | whose food is nectar |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Kama (the god of love) |
| नव्याम् | नव्य (२.१) | new |
| इक्षुरसोदधेः | इक्षुरस–उदधि (५.१) | from the ocean of sugarcane juice |
| यदि | यदि | if |
| सुधाम् | सुधा (२.१) | nectar |
| उत्थापयेत् | उत्थापयेत् (उद्√स्था +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | were to raise |
| सा | तद् (१.१) | that (nectar) |
| भवज्जिह्वायाः | भवत्–जिह्वा (६.१) | of your tongue |
| कृतिम् | कृति (२.१) | the creation |
| आह्वयेत | आह्वयेत (आ√ह्वे कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | would challenge |
| परमाम् | परम (२.१) | the ultimate |
| मत्कर्णयोः | अस्मद्–कर्ण (६.२) | for my two ears |
| पारणाम् | पारणा (२.१) | feast |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | न्मी | ल | द्गु | ड | पा | क | त | न्तु | ल | त | या | र | ज्ज्वा | भ्र | मी | र | र्ज | य |
| न्दा | ना | न्तः | श्रु | त | श | र्क | रा | च | ल | म | थः | स्वे | ना | मृ | ता | न्धाः | स्म | रः |
| न | व्या | मि | क्षु | र | सो | द | धे | र्य | दि | सु | धा | मु | त्था | प | ये | त्सा | भ | व |
| ज्जि | ह्वा | याः | कृ | ति | मा | ह्व | ये | त | प | र | मां | म | त्क | र्ण | योः | पा | र | णाम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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