खण्डक्षोदमृदि स्थले मधुपयःकादम्बिनीतर्पणा-
त्कृष्टे रोहति दोहदेन पयसां पिण्डेन चेत्पुण्ड्रकः ।
स द्राक्षाद्रवसेचनैर्यदि फलं धत्ते तदा त्वद्गिरा-
मुद्देशाय ततोऽप्युदेति मधुराधारस्तमप्प्रत्ययः ॥
खण्डक्षोदमृदि स्थले मधुपयःकादम्बिनीतर्पणा-
त्कृष्टे रोहति दोहदेन पयसां पिण्डेन चेत्पुण्ड्रकः ।
स द्राक्षाद्रवसेचनैर्यदि फलं धत्ते तदा त्वद्गिरा-
मुद्देशाय ततोऽप्युदेति मधुराधारस्तमप्प्रत्ययः ॥
त्कृष्टे रोहति दोहदेन पयसां पिण्डेन चेत्पुण्ड्रकः ।
स द्राक्षाद्रवसेचनैर्यदि फलं धत्ते तदा त्वद्गिरा-
मुद्देशाय ततोऽप्युदेति मधुराधारस्तमप्प्रत्ययः ॥
अन्वयः
AI
चेत् खण्डक्षोदमृदि स्थले मधुपयःकादम्बिनीतर्पणात् कृष्टे पयसां पिण्डेन दोहदेन पुण्ड्रकः रोहति, सः यदि द्राक्षाद्रवसेचनैः फलम् धत्ते, तदा त्वद्गिराम् उद्देशाय ततः अपि मधुराधारः तम् अप्रत्ययः उदेति ।
Summary
AI
If sugarcane were to grow in a field of powdered sugar candy, ploughed after being saturated by a cloud of honey and milk, and nourished by a lump of milk as a special craving; and if it bore fruit by being watered with grape juice, then to describe your words, a disbelief in that sugarcane as the ultimate basis of sweetness would arise.
पदच्छेदः
AI
| खण्डक्षोदमृदि | खण्डक्षोद–मृद् (७.१) | in the soil of powdered sugar candy |
| स्थले | स्थल (७.१) | in a place |
| मधुपयःकादम्बिनीतर्पणात् | मधु–पयस्–कादम्बिनी–तर्पण (५.१) | from being saturated by a cloud of honey and milk |
| कृष्टे | कृष्ट (√कृष्+क्त, ७.१) | when ploughed |
| रोहति | रोहति (√रुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | grows |
| दोहदेन | दोहद (३.१) | by the special craving (of pregnancy) |
| पयसाम् | पयस् (६.३) | of milk |
| पिण्डेन | पिण्ड (३.१) | by a lump |
| चेत् | चेत् | if |
| पुण्ड्रकः | पुण्ड्रक (१.१) | sugarcane |
| सः | तद् (१.१) | it |
| द्राक्षाद्रवसेचनैः | द्राक्षा–द्रव–सेचन (३.३) | by watering with grape juice |
| यदि | यदि | if |
| फलम् | फल (२.१) | fruit |
| धत्ते | धत्ते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | bears |
| तदा | तदा | then |
| त्वद्गिराम् | युष्मद्–गिर् (६.३) | of your words |
| उद्देशाय | उद्देश (४.१) | for the sake of describing |
| ततः | ततः | from that |
| अपि | अपि | even |
| उदेति | उदेति (उद्√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arises |
| मधुराधारः | मधुर–आधार (१.१) | as the basis of sweetness |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| अप्रत्ययः | अप्रत्यय (१.१) | a disbelief |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ख | ण्ड | क्षो | द | मृ | दि | स्थ | ले | म | धु | प | यः | का | द | म्बि | नी | त | र्प | णा |
| त्कृ | ष्टे | रो | ह | ति | दो | ह | दे | न | प | य | सां | पि | ण्डे | न | चे | त्पु | ण्ड्र | कः |
| स | द्रा | क्षा | द्र | व | से | च | नै | र्य | दि | फ | लं | ध | त्ते | त | दा | त्व | द्गि | रा |
| मु | द्दे | शा | य | त | तो | ऽप्यु | दे | ति | म | धु | रा | धा | र | स्त | म | प्प्र | त्य | यः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.