स्त्रीपुंसौ प्रविभज्य जेतुमखिलावालोचितौचित्ययो-
र्नम्रां वेद्मि रतिप्रसूनशरयोश्चापद्वयीं त्वद्भ्रुवौ ।
त्वन्नासाच्छलनिह्नुतां द्विनलिकीं नालीकमुक्त्येषिणो-
स्त्वन्निश्वासलते मधुश्वसनजं वायव्यमस्त्रं तयोः ॥
स्त्रीपुंसौ प्रविभज्य जेतुमखिलावालोचितौचित्ययो-
र्नम्रां वेद्मि रतिप्रसूनशरयोश्चापद्वयीं त्वद्भ्रुवौ ।
त्वन्नासाच्छलनिह्नुतां द्विनलिकीं नालीकमुक्त्येषिणो-
स्त्वन्निश्वासलते मधुश्वसनजं वायव्यमस्त्रं तयोः ॥
र्नम्रां वेद्मि रतिप्रसूनशरयोश्चापद्वयीं त्वद्भ्रुवौ ।
त्वन्नासाच्छलनिह्नुतां द्विनलिकीं नालीकमुक्त्येषिणो-
स्त्वन्निश्वासलते मधुश्वसनजं वायव्यमस्त्रं तयोः ॥
अन्वयः
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अखिलौ स्त्री-पुंसौ प्रविभज्य जेतुम् आलोचित-औचित्ययोः रति-प्रसूनशरयोः नम्राम् चाप-द्वयीम् त्वत्-भ्रुवौ वेद्मि । नालीक-मुक्ति-एषिणोः तयोः त्वत्-नासा-छल-निह्नुताम् द्वि-नलिकीम् (तूणीरम् वेद्मि) । त्वत्-निश्वास-लते मधु-श्वसन-जम् वायव्यम् अस्त्रम् (वेद्मि) ।
Summary
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To conquer all men and women separately, Rati and Kamadeva, having considered the propriety, use your two eyebrows as their pair of bent bows, I think. For them, desiring to shoot arrows, your nose is a pretext concealing a two-tubed quiver. And the creepers of your sighs are their wind-weapon, born of the spring breeze.
पदच्छेदः
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| स्त्रीपुंसौ | स्त्री–पुंस् (२.२) | woman and man |
| प्रविभज्य | प्रविभज्य (प्र+वि√भज्+ल्यप्) | having divided |
| जेतुम् | जेतुम् (√जि+तुमुन्) | to conquer |
| अखिलौ | अखिल (२.२) | all |
| आलोचितौचित्ययोः | आलोचित–औचित्य (६.२) | of the two who have considered the propriety |
| नम्रां | नम्र (२.१) | bent |
| वेद्मि | वेद्मि (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I consider |
| रतिप्रसूनशरयोः | रति–प्रसूनशर (६.२) | of Rati and Kamadeva |
| चापद्वयीं | चाप–द्वयी (२.१) | a pair of bows |
| त्वद्भ्रुवौ | त्वद्–भ्रू (२.२) | your two eyebrows |
| त्वन्नासाच्छलनिह्नुतां | त्वद्–नासा–छल–निह्नुता (२.१) | concealed by the pretext of your nose |
| द्विनलिकीं | द्वि–नलिकी (२.१) | a two-tubed (quiver) |
| नालीकमुक्त्येषिणोः | नालीक–मुक्ति–एषिन् (६.२) | of the two desiring to release arrows |
| त्वन्निश्वासलते | त्वद्–निश्वास–लता (१.२) | the creepers of your sighs |
| मधुश्वसनजं | मधु–श्वसन–ज (२.१) | born of the spring breeze |
| वायव्यम् | वायव्य (२.१) | wind-related |
| अस्त्रं | अस्त्र (२.१) | weapon |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्त्री | पुं | सौ | प्र | वि | भ | ज्य | जे | तु | म | खि | ला | वा | लो | चि | तौ | चि | त्य | यो |
| र्न | म्रां | वे | द्मि | र | ति | प्र | सू | न | श | र | यो | श्चा | प | द्व | यीं | त्व | द्भ्रु | वौ |
| त्व | न्ना | सा | च्छ | ल | नि | ह्नु | तां | द्वि | न | लि | कीं | ना | ली | क | मु | क्त्ये | षि | णो |
| स्त्व | न्नि | श्वा | स | ल | ते | म | धु | श्व | स | न | जं | वा | य | व्य | म | स्त्रं | त | योः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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