अङ्घ्रिस्थारुणिमेष्टकाविसरणैः शोणे कृपाणः स्फुटं
कालोऽयं विधिना रथाङ्गमिथुनं विच्छेत्तुमन्विच्छता ।
रश्मिग्राहिगरुत्मदग्रजसमारब्धाविरामभ्रमौ
दण्डभ्राजिनि भानुशाणवलये संसज्य किं निज्यते ॥
अङ्घ्रिस्थारुणिमेष्टकाविसरणैः शोणे कृपाणः स्फुटं
कालोऽयं विधिना रथाङ्गमिथुनं विच्छेत्तुमन्विच्छता ।
रश्मिग्राहिगरुत्मदग्रजसमारब्धाविरामभ्रमौ
दण्डभ्राजिनि भानुशाणवलये संसज्य किं निज्यते ॥
कालोऽयं विधिना रथाङ्गमिथुनं विच्छेत्तुमन्विच्छता ।
रश्मिग्राहिगरुत्मदग्रजसमारब्धाविरामभ्रमौ
दण्डभ्राजिनि भानुशाणवलये संसज्य किं निज्यते ॥
अन्वयः
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रथाङ्ग-मिथुनम् विच्छेत्तुम् अन्विच्छता विधिना अयम् कालः कृपाणः, अङ्घ्रि-स्थ-अरुणिम-इष्टका-विसरणैः शोणे, रश्मि-ग्राहि-गरुत्मत्-अग्रज-समारब्ध-अविराम-भ्रमौ, दण्ड-भ्राजिनि भानु-शाण-वलये संसज्य स्फुटम् किम् निज्यते?
Summary
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Is this sword of Time, wielded by Fate desiring to separate the Chakravaka pair, being clearly sharpened on the sun's whetstone-wheel? This wheel, shining with its axis and revolved unceasingly by Aruna, is made red by the spreading brick-like redness of the sun's rays.
पदच्छेदः
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| अङ्घ्रिस्थारुणिमेष्टकाविसरणैः | अङ्घ्रि–स्थ–अरुणिमन्–इष्टका–विसरण (३.३) | by the spreading of the brick-like redness of its feet (rays) |
| शोणे | शोण (७.१) | on the red one |
| कृपाणः | कृपाण (१.१) | sword |
| स्फुटं | स्फुटम् | clearly |
| कालोऽयं | कालः (१.१)–अयम् (१.१) | this time |
| विधिना | विधि (३.१) | by fate |
| रथाङ्गमिथुनं | रथाङ्ग–मिथुन (२.१) | the Chakravaka pair |
| विच्छेत्तुम् | विच्छेत्तुम् (वि√छिद्+तुमुन्) | to cut apart |
| अन्विच्छता | अन्विच्छत् (अनु√इष्+शतृ, ३.१) | by the one desiring |
| रश्मिग्राहिगरुत्मदग्रजसमारब्धाविरामभ्रमौ | रश्मिग्राहिन्–गरुत्मत्–अग्रज–समारब्ध–अविराम–भ्रमौ (७.१) | on which the unceasing revolution is begun by Aruna, Garuda's elder brother who holds the reins |
| दण्डभ्राजिनि | दण्ड–भ्राजिनि (७.१) | shining with a staff (axis) |
| भानुशाणवलये | भानु–शाण–वलय (७.१) | on the whetstone-wheel of the sun |
| संसज्य | संसज्य (सम्√सञ्ज्+ल्यप्) | having attached |
| किं | किम् | is it being |
| निज्यते | निज्यते (√निज् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | sharpened |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ङ्घ्रि | स्था | रु | णि | मे | ष्ट | का | वि | स | र | णैः | शो | णे | कृ | पा | णः | स्फु | टं |
| का | लो | ऽयं | वि | धि | ना | र | था | ङ्ग | मि | थु | नं | वि | च्छे | त्तु | म | न्वि | च्छ | ता |
| र | श्मि | ग्रा | हि | ग | रु | त्म | द | ग्र | ज | स | मा | र | ब्धा | वि | रा | म | भ्र | मौ |
| द | ण्ड | भ्रा | जि | नि | भा | नु | शा | ण | व | ल | ये | सं | स | ज्य | किं | नि | ज्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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