कुमुदमुदमुदेष्यतीमसोढा
रविरविलम्बितुकामतामतानीत् ।
प्रतितरु विरुवन्ति किं शकुन्ताः
स्वहृदि निवेशितकोककाकुकुन्ताः ॥
कुमुदमुदमुदेष्यतीमसोढा
रविरविलम्बितुकामतामतानीत् ।
प्रतितरु विरुवन्ति किं शकुन्ताः
स्वहृदि निवेशितकोककाकुकुन्ताः ॥
रविरविलम्बितुकामतामतानीत् ।
प्रतितरु विरुवन्ति किं शकुन्ताः
स्वहृदि निवेशितकोककाकुकुन्ताः ॥
अन्वयः
AI
रविः उदेष्यतीम् कुमुद-मुदम् असोढा (सन्) अविलम्बितु-कामताम् अतानीत् । स्व-हृदि निवेशित-कोक-काकु-कुन्ताः शकुन्ताः प्रति-तरु किम् विरुवन्ति?
Summary
AI
The sun, unable to bear the impending joy of the night-lotuses, hastened to set without delay. Why do the other birds cry out from every tree, as if the spear-like, plaintive cries of the Chakravakas have pierced their own hearts?
पदच्छेदः
AI
| कुमुदमुदम् | कुमुद–मुद् (२.१) | the joy of the night-lotus |
| उदेष्यतीम् | उदेष्यती (उद्√इ+स्य+शतृ, २.१) | that is about to rise |
| असोढा | असोढ (√सह्+क्त, १.१) | unable to bear |
| रविः | रवि (१.१) | the sun |
| अविलम्बितुकामताम् | अविलम्बितु–कामता (२.१) | the desire to not delay |
| अतानीत् | अतानीत् (√तन् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | exhibited |
| प्रतितरु | प्रति–तरु | on every tree |
| विरुवन्ति | विरुवन्ति (वि√रु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they cry out |
| किं | किम् | why |
| शकुन्ताः | शकुन्त (१.३) | birds |
| स्वहृदिनिवेशितकोककाकुकुन्ताः | स्व–हृद्–निवेशित–कोक–काकु–कुन्ताः (१.३) | who have placed the spear-like plaintive cries of the Chakravakas in their own hearts |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | मु | द | मु | द | मु | दे | ष्य | ती | म | सो | ढा | |
| र | वि | र | वि | ल | म्बि | तु | का | म | ता | म | ता | नीत् |
| प्र | ति | त | रु | वि | रु | व | न्ति | किं | श | कु | न्ताः | |
| स्व | हृ | दि | नि | वे | शि | त | को | क | का | कु | कु | न्ताः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.