अथ रथचरणौ विलोक्य रक्ता-
वतिविरहासहताहताविवास्रैः ।
अपि तमकृत पद्मसुप्तिकालं
श्वसनविकीर्णसरोजसौरभं सा ॥
अथ रथचरणौ विलोक्य रक्ता-
वतिविरहासहताहताविवास्रैः ।
अपि तमकृत पद्मसुप्तिकालं
श्वसनविकीर्णसरोजसौरभं सा ॥
वतिविरहासहताहताविवास्रैः ।
अपि तमकृत पद्मसुप्तिकालं
श्वसनविकीर्णसरोजसौरभं सा ॥
अन्वयः
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अथ सा अति-विरह-असहता अस्रैः आहतौ इव रक्तौ रथचरणौ विलोक्य, श्वसन-विकीर्ण-सरोज-सौरभम् तम् पद्म-सुप्ति-कालम् अपि अकृत ।
Summary
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Then, seeing the two Chakravaka birds, red as if struck and bloodied by the unbearable pain of their impending separation, she spoke about that time of evening when lotuses close and their fragrance is scattered by the breeze.
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| रथचरणौ | रथचरण (२.२) | the two Chakravaka birds |
| विलोक्य | विलोक्य (वि√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| रक्तौ | रक्त (२.२) | red |
| अतिविरहासहताहताविवास्रैः | अति–विरह–असहता–आहतौ (२.२)–इव–अस्रैः (३.३) | as if struck by the blood of unbearable extreme separation |
| अपि | अपि | also |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| अकृत | अकृत (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she spoke about |
| पद्मसुप्तिकालं | पद्म–सुप्ति–काल (२.१) | the time for the lotuses to sleep |
| श्वसनविकीर्णसरोजसौरभं | श्वसन–विकीर्ण–सरोज–सौरभ (२.१) | (the time) when the fragrance of lotuses is scattered by the wind |
| सा | तद् (१.१) | she |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | र | थ | च | र | णौ | वि | लो | क्य | र | क्ता | |
| व | ति | वि | र | हा | स | ह | ता | ह | ता | वि | वा | स्रैः |
| अ | पि | त | म | कृ | त | प | द्म | सु | प्ति | का | लं | |
| श्व | स | न | वि | की | र्ण | स | रो | ज | सौ | र | भं | सा |
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