अकृत परभृतः स्तुहिस्तुहीति
श्रुतवचनस्रगनूक्तिचुञ्चुचञ्चुः ।
पठितनलनुतिं प्रतीव कीरं
तमिव नृपं प्रति जातनेत्ररागः ॥
अकृत परभृतः स्तुहिस्तुहीति
श्रुतवचनस्रगनूक्तिचुञ्चुचञ्चुः ।
पठितनलनुतिं प्रतीव कीरं
तमिव नृपं प्रति जातनेत्ररागः ॥
श्रुतवचनस्रगनूक्तिचुञ्चुचञ्चुः ।
पठितनलनुतिं प्रतीव कीरं
तमिव नृपं प्रति जातनेत्ररागः ॥
अन्वयः
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श्रुत-वचन-स्रक्-अनूक्ति-चुञ्चु-चञ्चुः परभृतः 'स्तुहि स्तुहि' इति अकृत । (सः) पठित-नल-नुतिम् कीरम् प्रति इव, तम् नृपम् प्रति इव जात-नेत्र-रागः (अभवत्) ।
Summary
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The cuckoo, whose beak was expert at repeating the garland of words it heard, cooed 'Praise, praise!'. It seemed to develop affection towards both the parrot who had recited Nala's praise and towards the king himself.
पदच्छेदः
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| अकृत | अकृत (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made a sound |
| परभृतः | परभृत (१.१) | the cuckoo |
| स्तुहिस्तुहीति | स्तुहि (√ष्टु कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.)–स्तुहि (√ष्टु कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.)–इति | 'Praise, praise!' thus |
| श्रुतवचनस्रगनूक्तिचुञ्चुचञ्चुः | श्रुत–वचन–स्रज्–अनूक्ति–चुञ्चु–चञ्चु (१.१) | whose beak was expert in repeating the garland of heard words |
| पठितनलनुतिं | पठित (√पठ्+क्त)–नल–नुति (२.१) | the recited praise of Nala |
| प्रतीव | प्रति–इव | as if towards |
| कीरं | कीर (२.१) | the parrot |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| इव | इव | as if |
| नृपं | नृप (२.१) | the king |
| प्रति | प्रति | towards |
| जातनेत्ररागः | जात–नेत्र–राग (१.१) | in whom affection had arisen in the eyes |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | कृ | त | प | र | भृ | तः | स्तु | हि | स्तु | ही | ति | |
| श्रु | त | व | च | न | स्र | ग | नू | क्ति | चु | ञ्चु | च | ञ्चुः |
| प | ठि | त | न | ल | नु | तिं | प्र | ती | व | की | रं | |
| त | मि | व | नृ | पं | प्र | ति | जा | त | ने | त्र | रा | गः |
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