इति पठति शुके मृषा ययुस्ता
बहु नृपकृत्यमवेत्य सांधिवेलम् ।
कुपितनिजसखीदृशार्धदृष्टाः
कमलतयेव तदा निकोचवत्यः ॥
इति पठति शुके मृषा ययुस्ता
बहु नृपकृत्यमवेत्य सांधिवेलम् ।
कुपितनिजसखीदृशार्धदृष्टाः
कमलतयेव तदा निकोचवत्यः ॥
बहु नृपकृत्यमवेत्य सांधिवेलम् ।
कुपितनिजसखीदृशार्धदृष्टाः
कमलतयेव तदा निकोचवत्यः ॥
अन्वयः
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शुके इति पठति (सति), ताः बहु नृप-कृत्यम् सांधि-वेलम् च अवेत्य मृषा ययुः । तदा कुपित-निज-सखी-दृशा अर्ध-दृष्टाः (ताः) कमलतया इव निकोचवत्यः (आसन्) ।
Summary
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When the parrot recited this, the handmaidens left on the false pretext of the king's many evening duties. Glanced at sideways by their angry friend Damayanti, they shrank away, as if they were lotuses closing at dusk.
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus |
| पठति | पठति (√पठ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | recites |
| शुके | शुक (७.१) | when the parrot |
| मृषा | मृषा | on a pretext |
| ययुः | ययुः (√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they went |
| ता | तद् (१.३) | they |
| बहु | बहु | many |
| नृपकृत्यम् | नृप–कृत्य (२.१) | king's duties |
| अवेत्य | अवेत्य (अव√इ+ल्यप्) | having cited |
| सांधिवेलम् | सांधिवेल (२.१) | the evening time |
| कुपितनिजसखीदृशार्धदृष्टाः | कुपित–निज–सखी–दृश्–अर्ध–दृष्टाः (१.३) | glanced at sideways by their angry friend |
| कमलतया | कमलता (३.१) | by the nature of a lotus |
| इव | इव | as if |
| तदा | तदा | then |
| निकोचवत्यः | निकोचवत् (१.३) | closing/shrinking |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | प | ठ | ति | शु | के | मृ | षा | य | यु | स्ता | |
| ब | हु | नृ | प | कृ | त्य | म | वे | त्य | सां | धि | वे | लम् |
| कु | पि | त | नि | ज | स | खी | दृ | शा | र्ध | दृ | ष्टाः | |
| क | म | ल | त | ये | व | त | दा | नि | को | च | व | त्यः |
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