स्वेदाप्लवप्रणयिनी नवरोमराजी
रत्यै यदाचरति जागरितव्रतानि ।
आभासितेन नरनाथ मधूत्थसान्द्र-
मग्नासमेषुशरकेशरदन्तुराङ्गः ॥
स्वेदाप्लवप्रणयिनी नवरोमराजी
रत्यै यदाचरति जागरितव्रतानि ।
आभासितेन नरनाथ मधूत्थसान्द्र-
मग्नासमेषुशरकेशरदन्तुराङ्गः ॥
रत्यै यदाचरति जागरितव्रतानि ।
आभासितेन नरनाथ मधूत्थसान्द्र-
मग्नासमेषुशरकेशरदन्तुराङ्गः ॥
अन्वयः
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नरनाथ, यदा स्वेद-आप्लव-प्रणयिनी नव-रोम-राजी रत्यै जागरित-व्रतानि आचरति, (तदा त्वम्) आभासितेन मधु-उत्थ-सान्द्र-मग्न-असमेषु-शर-केशर-दन्तुर-अङ्गः (भवसि) ।
Summary
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O King, when her new line of hair, fond of the flood of perspiration, undertakes vows of wakefulness for love-play, your illuminated body appears to bristle with the filaments of Kamadeva's arrows, immersed in that thick, spring-like moisture.
पदच्छेदः
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| स्वेदाप्लवप्रणयिनी | स्वेद–आप्लव–प्रणयिनी (१.१) | loving the flood of perspiration |
| नवरोमराजी | नव–रोमन्–राजी (१.१) | the new line of hair |
| रत्यै | रति (४.१) | for love-play |
| यदा | यदा | when |
| आचरति | आचरति (आ√चर् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | performs |
| जागरितव्रतानि | जागरित–व्रत (२.३) | vows of wakefulness |
| आभासितेन | आभासित (आ√भास्+णिच्+क्त, ३.१) | by the shining |
| नरनाथ | नरनाथ (८.१) | O king |
| मधूत्थसान्द्रमग्नासमेषुशरकेशरदन्तुराङ्गः | मधु–उत्थ–सान्द्र–मग्न–असमेषु–शर–केशर–दन्तुर–अङ्ग (१.१) | (you) whose body bristles with the filaments of Kamadeva's arrows immersed in the thick, spring-born moisture |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वे | दा | प्ल | व | प्र | ण | यि | नी | न | व | रो | म | रा | जी |
| र | त्यै | य | दा | च | र | ति | जा | ग | रि | त | व्र | ता | नि |
| आ | भा | सि | ते | न | न | र | ना | थ | म | धू | त्थ | सा | न्द्र |
| म | ग्ना | स | मे | षु | श | र | के | श | र | द | न्तु | रा | ङ्गः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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