अस्या भवन्तमनिशं भवतस्तथैनां
कामः श्रमं न कथमृच्छति नाम गच्छन् ।
छायैव वामथ गतागतमाचरिष्णो-
स्तस्याध्वजश्रमहरा मकरध्वजस्य ॥
अस्या भवन्तमनिशं भवतस्तथैनां
कामः श्रमं न कथमृच्छति नाम गच्छन् ।
छायैव वामथ गतागतमाचरिष्णो-
स्तस्याध्वजश्रमहरा मकरध्वजस्य ॥
कामः श्रमं न कथमृच्छति नाम गच्छन् ।
छायैव वामथ गतागतमाचरिष्णो-
स्तस्याध्वजश्रमहरा मकरध्वजस्य ॥
अन्वयः
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कामः अनिशम् अस्याः (सकाशात्) भवन्तम्, तथा भवतः (सकाशात्) एनाम् गच्छन् कथम् नाम श्रमम् न ऋच्छति? अथ वाम् छाया इव गत-आगतम् आचरिष्णोः तस्य मकरध्वजस्य अध्व-ज-श्रम-हरा (अस्ति) ।
Summary
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How is it that Kamadeva, constantly going from her to you and from you to her, does not feel any fatigue? Or perhaps, your mutual reflection, like a shadow, removes the journey's fatigue for Kamadeva, who is accustomed to this coming and going.
पदच्छेदः
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| अस्या | इदम् (५.१) | from her |
| भवन्तम् | भवत् (२.१) | to you |
| अनिशं | अनिशम् | constantly |
| भवतः | भवत् (५.१) | from you |
| तथा | तथा | and so |
| एनां | एनद् (२.१) | to her |
| कामः | काम (१.१) | Kamadeva |
| श्रमं | श्रम (२.१) | fatigue |
| न | न | not |
| कथम् | कथम् | how |
| ऋच्छति | ऋच्छति (√ऋ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gets |
| नाम | नाम | indeed |
| गच्छन् | गच्छत् (√गम्+शतृ, १.१) | going |
| छायैव | छाया (१.१)–इव | like a shadow |
| वाम् | युष्मद् (६.२) | of you two |
| अथ | अथ | or perhaps |
| गतागतमाचरिष्णोः | गत–आगत–आचरिष्णु (६.१) | of him who is habituated to coming and going |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| अध्वजश्रमहरा | अध्वन्–ज–श्रम–हरा (१.१) | remover of the fatigue born of the journey |
| मकरध्वजस्य | मकरध्वज (६.१) | of Kamadeva |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्या | भ | व | न्त | म | नि | शं | भ | व | त | स्त | थै | नां |
| का | मः | श्र | मं | न | क | थ | मृ | च्छ | ति | ना | म | ग | च्छन् |
| छा | यै | व | वा | म | थ | ग | ता | ग | त | मा | च | रि | ष्णो |
| स्त | स्या | ध्व | ज | श्र | म | ह | रा | म | क | र | ध्व | ज | स्य |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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