वस्तु विश्वमुदरे तव दृष्ट्वा
बाह्यवत्किल मृकण्डुतनूजः ।
स्वं विमिश्रमुभयं न विविञ्च-
न्निर्ययौ स कतमस्त्वमवैषि ॥
वस्तु विश्वमुदरे तव दृष्ट्वा
बाह्यवत्किल मृकण्डुतनूजः ।
स्वं विमिश्रमुभयं न विविञ्च-
न्निर्ययौ स कतमस्त्वमवैषि ॥
बाह्यवत्किल मृकण्डुतनूजः ।
स्वं विमिश्रमुभयं न विविञ्च-
न्निर्ययौ स कतमस्त्वमवैषि ॥
अन्वयः
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किल मृकण्डु-तनूजः तव उदरे बाह्यवत् विश्वम् दृष्ट्वा, स्वम् (च दृष्ट्वा), विमिश्रम् उभयम् न विविञ्चन् सः निर्ययौ। (तयोः मध्ये) कतमः (सः इति) त्वम् अवैषि।
Summary
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Indeed, Markandeya, after seeing the entire universe within your belly just as it was outside, and also seeing himself there, came out unable to distinguish between the two mixed realities. Only you know which of the two Markandeyas was the real one.
पदच्छेदः
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| वस्तु | वस्तु (१.१) | substance |
| विश्वम् | विश्व (२.१) | the universe |
| उदरे | उदर (७.१) | in the belly |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| बाह्यवत् | बाह्यवत् | as it was outside |
| किल | किल | indeed |
| मृकण्डुतनूजः | मृकण्डु–तनूज (१.१) | the son of Mrikandu (Markandeya) |
| स्वं | स्व (२.१) | himself |
| विमिश्रम् | विमिश्र (२.१) | mixed together |
| उभयं | उभय (२.१) | both |
| न | न | not |
| विविञ्चन् | विविञ्चत् (वि√विच्+शतृ, १.१) | distinguishing |
| निर्ययौ | निर्ययौ (निर्√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he came out |
| सः | तद् (१.१) | he |
| कतमः | कतम (१.१) | which one |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अवैषि | अवैषि (अव√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you know |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | स्तु | वि | श्व | मु | द | रे | त | व | दृ | ष्ट्वा |
| बा | ह्य | व | त्कि | ल | मृ | क | ण्डु | त | नू | जः |
| स्वं | वि | मि | श्र | मु | भ | यं | न | वि | वि | ञ्च |
| न्नि | र्य | यौ | स | क | त | म | स्त्व | म | वै | षि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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