श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
अन्याक्षुण्णरसप्रमेयभणितौ विंशस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
अन्याक्षुण्णरसप्रमेयभणितौ विंशस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
अन्याक्षुण्णरसप्रमेयभणितौ विंशस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तदीये अन्याक्षुण्णरसप्रमेयभणितौ नलस्य चरिते महाकाव्ये निसर्गोज्ज्वलः अयम् विंशः सर्गः व्यगलत् ।
Summary
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Srihira, a diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings, and Mamalladevi gave birth to the son Sriharsha, who had conquered his senses. In his great epic, the story of Nala, which is composed of untrodden aesthetic sentiments and subject matter, this naturally brilliant twentieth canto has concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | a diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जितेन्द्रियचय (२.१) | one who has conquered the host of senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| अन्याक्षुण्णरसप्रमेयभणितौ | अन्य–अक्षुण्ण (अ√क्षुद्+क्त)–रस–प्रमेय–भणिति (७.१) | in the composition of untrodden aesthetic sentiments and subject matter |
| विंशः | विंश (१.१) | twentieth |
| तदीये | तदीय (७.१) | in his |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| व्यगलत् | व्यगलत् (वि√गल् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has concluded |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| चरिते | चरित (७.१) | in the story |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्गोज्ज्वलः | निसर्गोज्ज्वल (१.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| अ | न्या | क्षु | ण्ण | र | स | प्र | मे | य | भ | णि | तौ | विं | श | स्त | दी | ये | म | हा |
| का | व्ये | ऽयं | व्य | ग | ल | न्न | ल | स्य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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